वो किराए का घर और फ़्लैट

हिना कॉल

किराए का घर छोड़कर अपने इस नए फ़्लैट में आए मुझे इक्कीस साल गुज़र चुके हैं। ये साल व्याकुल, परित्यक्त और वीरान से गुज़रते गए। दुःस्वप्न, क्षीण रुदन और झुर्रीदार चेहरे मेरा हर जगह पीछा करते रहे। मैं व्यग्र और उलझा सा रहता। मुझे हर रोज़ देर रात धुंधली आँखों और सूखे होठों के सपने जगा देते। वे आधी रात को आविर्भूत होते और सुबह होने तक गायब हो जाते। मैंने अपने कपड़े पैक किए और घर से बाहर आ गया। मुझे नहीं पता था कि मैं कहाँ जा रहा हूँ। लेकिन मैं रेलवे स्टेशन गया, एक टिकट ख़रीदी और ट्रेन पर सवार हो गया। कुछ घटनाओं के बेतरतीब से चित्र उभरने लगे। मुझे प्यास लगी। ट्रेन अगले स्टेशन पर रुकी और मैं उतर गया। मुझे एक घोड़ा गाड़ी दिखी मानो मुझसे बैठने का आग्रह कर रही हो। मैं सोच रहा था कि मुझे कहाँ जाना है। जब भी मैंने अपनी ऑंखें बंद कीं तो असंगठित से चित्र दिखाई दिए और मुझे उन्हीं धुंधली आँखों और फटे होंठों के दर्शन हुए। एक बूढ़ी महिला ने हाथ लहराया और गाड़ी चालक को दिशा दिखाई। सड़क जर्जर हालत में थी। मैंने गाड़ी के ड्राइवर को रुकने के लिए कहा लेकिन उसने मुझे अनसुना कर दिया। अंततः उसने मुझे एक स्थान पर छोड़ा और जल्दी में निकल गया। जैसे ही मैं घोड़ा-गाड़ी से नीचे उतरा, एक आधे-अधूरे से कपड़े पहने बच्चे ने मुझे पकड़ लिया। वह बच्चा मुझे एक घर में ले गया।

घर खम्भों पर खड़ा था। कमरा मकड़ी के जालों से अटा पड़ा था। पुराने चित्र आंशिक रूप से दिखाई दे रहे थे। बच्चे ने मेरा बाँया हाथ छोड़ा और कमरे के एक कोने में चला गया, जहाँ एक पुराना बंद पड़ा, ज़ंग लगा हुआ ट्रंक रखा था। घड़ी की टिक-टिक साफ़ सुनाई पड़ती थी। अचानक एक ज़ोर का धमाका हुआ और बल्ब फूट पड़ा। इसी के साथ-साथ वो बच्चा भी ग़ायब हो गया। मैं लोगों से घिरा हुआ था। वे एक दूसरे को बधाई दे रहे थे। मैंने एल्बम का एक और पन्ना पलटा। अचानक एक और बिजली कड़की और सब कुछ भ्रामक और पेचीदा-सा हो गया। लोग इधर-उधर भागने लगे। उन्होंने उस आदमी को देखा जिसे गोली मारी गई थी। उन्होंने उसे मरते हुए देखा। उसकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया। बाद में, शव को उसकी पत्नी और दो बच्चे ले गए। एक अन्य स्थान पर सिर्फ़ एक सर-कटा धड़ रखा हुआ था। मैं अपने परिवार के सदस्यों के साथ कमरे में छिप गया। हर जगह सन्नाटा पसरा था। यहाँ तक​ कि दरवाज़े की एक दस्तक तक ने हमें डरा दिया। किसी ने दरवाज़ा खोलने की हिम्मत नहीं की। हमें क़दमों की आवाज़ें और ज़ोर की चीखें सुनाई दीं। हमें समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है। इतनी ही देर में गोलियों के चलने की आवाज़ सुनाई पड़ी।

मेरी दादी ने दरवाज़ा खोलने के लिए हिम्मत जुटाई। वे दरवाज़े पर एक पड़ोसी को देख हैरान हो गयीं। पड़ोसी ने उनसे कहा- “जितनी जल्दी हो सके सामान बाँधो और ये जगह छोड़ दो। उन्होंने उसे पीटा और गोली मार दी। वे हमें भी नहीं छोड़ेंगे। हमारे बेटों के नाम हिट-लिस्ट में आ चुके हैं। मैंने दो लड़कों को एक दूसरे से बात करते हुए सुना। उन्होंने हमारे घर की ओर इशारा किया। वे बंदूकें पकड़े हुए थे।”

मेरी दादी ने कहा, “क्या तुम पागल हो? यह तुम्हारा भ्रम हो सकता है। हमारे दोस्तों ने हमें आश्वासन दिया है कि हम यहाँ सुरक्षित रहेंगे।”

मेरे पड़ोसी ने कहा, “मैंने उन लड़कों का चुपचाप पीछा किया और उन्हें उसे पीटते देखा। वे उसे घर से घसीट कर ले गए, भीड़ के सामने उसकी पिटाई की और अंत में उसे मार डाला। हम यहाँ सुरक्षित नहीं हैं। हमारे लिए यहाँ से चले जाने में ही भलाई है वरना हम भी मारे जाएँगे। अपने बच्चों और पोते के बारे में सोचिए।”

उसी रात हमने फिर दरवाज़े पर दस्तक सुनी। मैंने पर्दा हटाकर देखने की कोशिश की कि दरवाज़े पर कौन हो सकता है। उसने जल्दी से दरवाज़ा खोला और हम सब को अलविदा कह दिया।

मैंने एल्बम का एक और पन्ना पलटा। मैं दुविधा में था। मेरे माता-पिता पैकिंग कर रहे थे और चीज़ों को एक ट्रंक में डाल रहे थे। मैंने अपने कमरे, अपनी कॉमिक्स, अपने खिलौने, अपने दोस्तों, अपनी स्वतंत्रता के बारे में सोचा। एक दर्पण दीवार से गिर गया और टुकड़ों में टूट गया। मैं उन टुकड़ों के पास गया और ख़ुद को, अपने माता-पिता और दादा-दादी को बिखरा हुआ पाया। मैं चुप था।

मुझे एक आवाज़ सुनाई दी। वह एक छोटी लड़की की थी। वह मुझे घर से बाहर ले गई। मुझे कई गाँवों से गुज़रना पड़ा। मुझे अनजान पहाड़ी क्षेत्रों और मैदानों की ओर ले जाया जा रहा था। मैं पहाड़ों से घिरी एक जगह पर पहुँचा। जिसने मुझे एक क्षणिक खुशी से भर दिया। मैं अपनी जड़ों और मन की शांति के लिए तरस रहा था। बच्ची मुझे एक कमरे में ले गयी। कमरे में घुसते ही वो गायब हो गयी। मैं स्तब्ध खड़ा रहा। मुझे लगा कि मेरे चारों ओर कुछ घूम रहा है। मैंने महसूस किया कि कमरे में बिच्छू और छिपकलियाँ थे। जैसे ही मैंने एल्बम का एक और पन्ना पलटा, लोगों की धुंधली तस्वीरें और चित्र मेरे सामने दृष्टिगोचर हुए। चेहरे खाली थे और मन उलझे हुए। उनकी गति, क्रीड़ाएँ, विचार और शब्द क्षीण लग रहे थे। उनके विचारों और कार्यों में विरोधाभास था। यादें फीकी पड़ती जा रही थीं। उन्होंने क्षय, मनोभ्रंश और अल्पता के लक्षण दिखाए। धीरे-धीरे मैंने देखा कि कुछ गलत हो रहा है। परिवार में बड़े-बुज़ुर्ग अपनी जड़ों को उखड़ता हुआ महसूस कर रहे थे। अस्तित्व का खो जाना, मानसिक पीड़ा, खोई स्मृतियाँ और उदासीनता उनके जीवन को गढ़ रही थी। वे अपनी ही काल्पनिक दुनिया में तल्लीन थे। मैं फ़ोटो देख ही रहा था कि एक बुज़ुर्ग आदमी आया।

उसने कहा, “क्या ले आया तुम्हें यहाँ? तुम हमें परेशान करने के लिए यहाँ क्यों आए? हमसे क्या चाहते हो?”

मैंने कहा- “एक छोटी बच्ची मुझे यहाँ खींच कर ले आई। आप नाराज़ क्यों हैं? मैंने क्या किया? मैंने तो आपका ध्यान रखा।”

उस बुज़ुर्ग व्यक्ति ने जवाब दिया- “तुमने सिर्फ़ जिस्मानी तौर पर मेरी देखभाल की, मुझे दवाइयाँ दीं, मेरे साथ बातचीत की, मेरी हर तरह से मदद की। जब तुम्हारी ज़रूरत थी, तुम वहाँ थे। लेकिन क्या तुमने मेरे मानसिक दर्द, मेरी व्यथा, नए वातावरण के साथ मेरे संघर्ष, स्मृति और मेरी पहचान और अस्मिता को लगे आघात का ख़याल रखा? तुम इतने वर्षों तक कहाँ थे? क्या कभी तुम्हारे भीतर मेरे लिए वो तड़प जगी जो मेरे भीतर अपने घर के लिए है?”

रौशनी की एक चमक के साथ एक बुज़ुर्ग महिला दिखाई दी। वो पीड़ा में थी। उन्होंने कहा- “मैं हमेशा एक सामाजिक वृत्त और तुम्हारी संगति और बातों कि लिए तरसती रहती थी। तुम बस ख़ुद में और ख़ुद के काम में मशगूल थे। हमारे बारे में भूल ही गए। बड़े होने पर तुमने हमसे बात करना बंद कर दिया। तुम मुझसे लड़ा करते थे। तुमने मुझे उस क्षण छोड़ दिया, जब मुझे तुम्हारी मौजूदगी की ज़रूरत थी। मैं तुम्हारी मौजूदगी के लिए तरस गयी। मैं तुमसे प्यार करती थी और देखो मुझे बदले में क्या मिला! मैं कई दिनों तक ज़िंदगी के लिए जूझ रही थी। मुझे लगा था कि तुम मुझे देखने आओगे।”

तस्वीर में मौजूद आदमी और औरत ने मेरा हाथ पकड़ लिया। मैं चीखता रहा लेकिन मैं अपनी आवाज भी नहीं सुन पा रहा था। उन्होंने कहा, “हमें भी तुमसे ये उम्मीद नहीं थी। तुम अपने काम और ज़िंदगी में व्यस्त रहे। तुम हमारे बारे में भूल गए। हमें तुमसे ये उम्मीद नहीं थी। इस बुढ़ापे में हम सब अकेले हैं। हमारे पास अपनी भावनाओं को साझा करने के लिए कोई नहीं है।”

मुझे बिखरा हुआ-सा महसूस हुआ। मैं अपने घुटनों के बल झुक गया। मैंने एल्बम का एक और पन्ना पलटा। मैंने एक परछाई देखी। मैंने उसे पहचान लिया। यह वही छाया थी जो मुझे बरसों पहले छोड़ गई थी। वो मेरे सामने खड़ी थी। उसने आवाज़ दी, “तो, तुम वापस आ गए। मैंने तुम्हें उन्हें छोड़ने के लिए नहीं कहा था … लेकिन तुम्हारे पास  जानने के लिए अपनी आकांक्षाएँ, इच्छाएँ और सपने थे। अब वापस क्यों आ रहे हो? तुम यहाँ क्या करने आए हो? अब किसी को तुम्हारी ज़रूरत नहीं है।”

मैंने कहा, “क्या तुम्हें लगता है कि मैं इसके लिए ज़िम्मेदार हूँ?”

परछाई ने कहा, “मैंने तुम्हें इस जगह, इस घर और इस परिवार को छोड़ने से पहले सोचने के लिए कहा था।”

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