मैं तितलियों का घर हुआ हूँ अभी-अभी

हर्ष भारद्वाज

1

अब जब कि मैं यहाँ बैठा हूँ, इस नदी के किनारे और मैं यह कभी जान नहीं सकता कि यह कोई ख़्वाब है या नहीं, मैं अपने भीतर की अस्थिरता को इस लम्हे की शान्ति से जुड़ता हुआ महसूस कर रहा हूँ।
सभी सवालों के परे, घटनाएँ केवल घटने को आतुर हैं।
कुछ भी होने का फ़लसफ़ा मानो सिमट आया हो सिर्फ़ नज़र आने में-
हरे मैदानों के बीच, एक भूरी नदी का रास्ता;
एक लकीर, जहाँ नदी ख़त्म होती है
और उस लकीर के पार, आसमाँ का वह सब कुछ होना जो खुली या बंद आँखों से मैं देख सकता हूँ!

मैं, हवाओं-सा बह रहा हूँ और मौसम-सा बदल रहा हूँ। मैं तितलियों का घर हुआ हूँ अभी-अभी।
मैं एहसास से भर रहा हूँ इस क़दर कि तुमको महसूस कर रहा हूँ ख़ुद में। मैं तुम्हारी रूह से, सूखे पत्तों सा झड़ रहा हूँ।

मुरझाए फूल-सा,
मैं रंगों की कमी से मर रहा हूँ अब।
मुझे मरने दो।

2

मैं बरामदे में बैठा होता हूँ अक़्सर
पिता जी की दी हुई घड़ी के साथ
वक़्त उदास है जिसमें,
माँ की आँखों-सा
छप्पड़ के नीचे से गुज़र रहे बाँस में ठुकी किसी कील से लटक रहा है।
पिता जी वहीं से उतारे गए थे एक सुबह,
जब एक रात ज़िन्दगी की गाँठें
इतनी कस गयी थीं उनकी गर्दन पर
कि वे जान गए थे
कि उन्हें खोलने के सभी प्रयास अब व्यर्थ हैं
और वे उनके साथ ही सो लिए।

वे इतिहास के विद्यार्थी रह चुके थे
पर उन्होंने कभी
इतिहास पर कुछ भी नहीं बोला।
वे मिट्टी की बातें किया करते थे,
किसी भी आम किसान की तरह
वे धूप और बारिश की बातें किया करते थे।
वे भूख को समझते थे
जैसा हर किसान समझता है,
वे देश पर बहस नहीं करते
आम लोगों की तरह,
वे अपने खेतों में कविताएँ गाते
अपनी फसलों को बाँसुरी सुनाते,
वे अक़्सर ठंड में
धान के किनारे सरसों-से उग आते।
पर यह बहुत पहले की बात थी;
आम किसान की तरह
वक़्त ने उन्हें भी
मकई बना दिया था
बाद के दिनों में।

मैंने उनकी गली हुई एड़ी पर मरहम लगाया
उनकी आँखों की चोट को
बेहद क़रीब से जाना है,
उनके घुट्टी के दर्द को भी।
मैंने उन्हें ऐसे मरता हुआ देखा
इस दौर के हर किसान को मरना है जैसे,
नींद में हिचकियाँ लेते हुए
वे जागते रहे
और सपनों का क़र्ज़ बढ़ता रहा, बढ़ता रहा,
एक रात
उनके गले में एक रस्सी डालकर
उन्हें नीचे फेंक दिया गया
धरती की ओर
जिसके प्रेम में वो जीते रहे
जीते रहे थे
अब तक।

पर
कभी-कभी
बहुत अँधेरे में
आँखें हक़ीक़त को लाँघ जाती हैं
और मेरे सिरहाने पड़ी घड़ी
उलटी तरफ़ को चलने लगती है।
मैं उनके हाथों को पकड़कर
सोया होता हूँ।
वे मुझे सपनों के खेत में
अपने कन्धों पर बिठाकर ले जा रहे हैं;
वहाँ नीली ज़मीन पर सरसों उगी है
चलने को कोई आयर नहीं है
पिताजी पाश का कोई गीत गाते हुए
आगे-आगे,
खेत के बीचों-बीच, बढ़ रहे हैं
किसी बस्ती की ओर।

19 वर्ष के हर्ष भारद्वाज परवाहा गाँव, अररिया के रहने वाले हैं। आपने लोयोला उच्चविद्यालय, पटना से बारहवीं उत्तीर्ण की।

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