मि. वॉलरस

मनीषा कुलश्रेष्ठ

विंडचाइम हवा में डोला और मेरी नींद खुल गई। मैं एक उदास सपने के आग़ोश में वैसे ही सोया था, जैसे तूफ़ान भरी रात में भटक कर कोई एडवेंचरिस्ट अपने तम्बू में सोता है; लगातार तूफ़ान के बदतर हो जाने की आशंका में। जब उठा तो देखा कि तूफ़ान थम गया है, बाहर – भीतर सब तहस – नहस करके और अब मंद बयार चल रही है। जब सोया था तो इस सोफ़े का रंग सलेटी दिखा था, राख – सा। सामने जो पेंटिंग लगी है, वह भी कितनी डरावनी लग रही थी। बस तीन डरावने चेहरे। परदों की सफ़ेदी बर्फ़ीली थी। विण्डचाइम चुप था, रात भर घबराई हुई टिटहरी बोलती रही थी। अब जागा हूँ तो अपना चतुर्दिक पहचानना चाहता हूँ। मैं सुन्दर फ़िरोज़ी, सुनहरे फूलों वाले सोफ़े पर लेटा हूँ, सामने तीन चेहरे राजस्थानी स्त्रियों के हैं, उनमें से एक दुल्हन है। परदे सफ़ेद नहीं मोती -सी आभा वाले हैं, उन पर सारसों वाला मोटिफ़ है, सेल्फ़ प्रिंट-सा।

लेकिन, यह घर किसका है? ओह! वह है कहाँ? मैं चादर फेंक कर अजनबी घर के भीतर दौड़ता हूँ। छोटा – सा घर है। एक कमरा खोलता हूँ, वह स्टडी – रूम है, किताबों से भरा, एक ईज़ल पर अधूरा पेंट किया कैनवास टँगा है, उस पर धूल जमी है, जैसे उसे कबसे अधूरा छोड़ा हो, वह इस अधूरेपन में, धूल के साथ भी कलात्मक हो सकता था, मगर किसी ने उस पर मोटे ब्रश से स्याही फेर दी है। क्यों? बगल की टेबल पर एक काँच के गिलास में रजनीगन्धा के फूलों की सूखी टहनियाँ हैं? एक किताब खुली पड़ी है, एक कविता पर अटकी ‘मुक्ति प्रसंग’?

मैं अगले कमरे में जाता हूँ। दरवाज़ा खुला है, बस परदा पड़ा है,  भारी – सा और गहरा नीला।  मैं ठिठकता हूँ, खोलूँ के न खोलूँ, मगर रात को ज़हन के कैनवास पर भी तो किसी ने मोटे ब्रश से मृत्यु का स्याह स्ट्रोक…. मैं हटा ही देता हूँ, कमरे में दवा की गंध का कसैला–पन था। मैं खिड़की खोल देना चाहता हूँ, किंतु वह सोई है, औंधी, पेट के बल। काली टी शर्ट में … ठीक ऐसे ही जा पड़ी थी वह बिस्तर पर। उसके जूते मैंने उतारे थे।  ज़ुराबें अब भी पैरों में हैं। एक पैर बिस्तर से बाहर लटका है । उसकी बगल में बच्चा भी बेसुध सो रहा है। बच्चे के होंठ खुले हैं, कभी कभी वो उन्हें हिलाता है, मानों माँ का स्तन या बॉटल उसके मुँह में हो, शायद भूखा है।  मैं सिहर जाता हूँ, कैसे दु:स्वप्न से निकले हैं दोनों, आगे भी कौनसे सब्ज़बाग हैं? मैं चुपचाप बाहर आ जाता हूँ। क्यों लिया होगा ऎसानिर्णय? जो निर्णय जीवन को….खैर..मैं रात की घटना नहीं सोचना चाहता। सिगरेट सुलगा लेता हूँ।

बालकनी में धूप आई – स्पाई खेल रही है। मौसम में ठंडक आने लगी है।

मुझे लगा, भीतर बच्चा कुनमुना रहा है, वह अब भी बेसुध पड़ी है। ‘सोएगी अभी,’ डॉक्टर ने कहा था इन्हें दस घण्टे की नींद लेने दें। मैं बॉलकनी तक बच्चे की ‘कुनमुन’ सुन पा रहा हूँ। अब, भीतर लपकता हूँ। बच्चे की चमकीली काली आँखॆं खुली हैं, वह माँ की तरफ पलट कर उसकी आकृति से बातें कर रहा है, कभी हिलते परदे से और रोशनी के टुकड़ों से – गा गू..गू ..गु..किलक भरी आवाज़ में कि मानो कह रहा हो, ‘अच्छा हुआ न ममी हम फिर यहीं हैं, ये अपनी प्यारी दुनिया, तुम और मैं और ये रोशनी के गोले…और मीठा दूध, मम्मी भूख… ।’

अब उसकी आवाज़ में हल्की खीज आने लगी है, किलक…खुन – खुन में बदल गई है। वह अँगूठा नहीं, पूरी मुटठी चूस रहा है। नीचे सूसू का नन्हा तालाब बन गया है। मैं उसे आहिस्ता से एक ही बाज़ू से उठा लेता हूँ, वह चौंकता है मगर रोता नहीं है। बाँह पकड़ लेता है, वह ऐसे भी रोता कम ही है, ‘जॉली गुड फैलो ! ब्रेव बॉय !’ मैं उसके कान में फ़ुसफ़ुसाता हूँ और बाहर ड्राईंगरूम में उठा लाता हूँ। उसे सोफ़े पर लिटा देता हूँ।  वह ग़ौर से मेरा चेहरा देखता है, क्या इसे रात की पहचान याद होगी? डायपर बदलते हुए मुझे, वर्तमान ज़िन्दगी के पीछे कहीं लपेट कर रख दिया समय याद आ जाता है। जब घर नामका ‘ओएसिस’ मेरे हिस्से भी आया था।

रसोई तरतीब से जमी है। बहुत कम सामान, मगर पर्याप्त। मैं बॉटल उबालता हूँ। फ़ॉर्मूला मिल्क पाउडर से दूध बनाता हूँ, बच्चा चुपचाप दूध पी रहा है, उसकी काली चमकीली आँखें सतत मेरे ऊपर लगी हैं। मेरी उपस्थिति उसे सुरक्षित और असुरक्षित दोनों कर रही है। वह थोड़ी देर बाद पैर चलाने लगता है और मैं अखबार उठा लेता हूँ। मेरा अखबार में मन नहीं लग रहा, मगर बच्चा अख़बार पर हल्के – हल्के पैर लगा कर खुश हो रहा है।

“ तुमने गलत लड़की को चुन लिया।मुझे ही क्यों चुना इतनी लड़कियों में से, तुम से तो कोई भी आकृष्ट होती। तुम्हारे डील – डौल और चेहरे से नहीं मि. वालिया ! तुम्हारे पॉवरफुल होने से! क्या मैं सस्ती दिखी, क्या मैं श्रापित थी? मैं वो पपेट नहीं, जो तुम चाहते थे, मैं तुम्हारी लाल – पीली आँखें अब नहीं झेल पाऊँगी। मैं अलग हूँ। मैंने तुम्हें निराश किया न बच्चा पैदा करके, तो मुझे छोड़ दो अब…” इस से पहले कि मेरी स्मृतियाँ और ग्लानि मुझे खा जाएँ,  वह बार के पीछे खड़ी फुसफुसा रही थी।

उसने उसका हाथ ज़ोर से पकड़ लिया, वह फुसफुसाहटों में चीखी “…help?….”

“ I DONT NEED THIS SHIT !!! पागल हो? क्या यह बाद में तय नहीं हो सकता?”

“why don’t you just f*ck off , why can’t you just leave me here and let me DIE!???”

“सुनो…”         

“नहीं सुनना कुछ।  जब से आई हूँ, तुम्हारी पत्नी ज़लील कर रही है, जबकि तुम्हीं ने बुलाया था। तुमने कहा कि वह स्वीकार कर चुकी है, मेरा होना, इस बच्चे का होना।” बच्चा, स्ट्रॉलर में बैठा अँगूठा चूस रहा था, मित्र ने बच्चे को देखा “YOU PATHETIC!” और गहरी साँस लेकर चला गया।

जैसे ही मेहमान विदा हुए, वह बच्चे का कुछ सामान लेने भीतर गई, मैं अपनी जैकेट लेने, तब ये वाक़या हुआ।

अन्दर मित्र – पत्नी ने ज़ेवरों के साथ सौजन्यता उतार फेंकी और बिना भूमिका उसे धर लिया, “ इस बच्चे को लेकर अब और इमोशनल ब्लैक मेलिंग नहीं चलेगी, समझी ! ”

“ माफ़ कीजिएगा, मैंने आपसे इसके लिए क्या माँगा? या आपके पति से? आपके डाउट्स क्या हैं? ”

चाँटा गूँज गया स्टडी में, उसके बाल चेहरे पर बिखर गए, वह स्तब्ध रह गई, बिना रोए, बच्चे को स्ट्रॉलर से उठा कर, स्ट्रॉलर वहीं छोड़ कर चली गई।

“सारा शहर जानता रहा है और मुझे तुम दोनों अब तक बेवक़ूफ़ बनाते रहे कि ये बच्चा…बोलो जी..तुम बोलो!”

वह अपनी पत्नी के हिस्टीरिक सवाल वहीं छोड़, मुझे साथ घसीटते हुए, बाहर ले आया.“अजीत, वह ऎसी मानसिकता में कुछ कर बैठी तो? ऎसे में कैसे ड्राईव करेगी? तू जा साथ।”

“मैं?” मैं तमाशबीन महज़ था अब तक कि अचानक दायित्व आ गिरा। मन ही मन उलझन हुई। मगर दो ज़िन्दगियाँ असली क्लेश में थीं, एक बच्चा और दूसरी भी तो बच्ची। शिकारी कुत्ते से बच कर भागे, दो नन्हे ख़रगोश! पहली बार उसे देखा, एक नाज़ुक – सी लड़की। वह अपनी छोटी–सी लाल कार में स्टियरिंग पर सर रखे फूट – फूट कर रो रही थी। बच्चा पीछे की सीट पर बेबी सेफ़ सीट में बँधा था, बेल्ट से और अन्दर की खींचतान से त्रस्त और माँ को रोते देख हिचकियों से रो रहा था।

अन्दर से मित्र की दहाड़ उभरी, “हाँ मेरा है वह बच्चा ! फिर भी तुम्हें, उसे घर बुलाकर चाँटा नहीं मारना चाहिए था।”

उसकी पत्नी की तीखी आवाज़ दलील पेश कर रही थी……. “हाँ वो चाँटा , दरअसल मारना तो तुम्हें चाहिए था?”

“हाँ मार लो…नहीं तो मैं मार लेता हूँ खुद को…. करो, करो तमाशा, मेरे बड़े होते बच्चों के आगे…”

मैं अचानक ही जैसे किसी ऐसी डूबती नाव में धकेल दिया गया था, जिसके चप्पू नदारद थे, मुझे कुछ जुगत लगानी थी। बात और बढ़ेगी मुझे पता था, अब मुझे हाथ से चप्पू चलाने होंगे। मैंने कार का दरवाज़ा खोला और कुछ कड़क आवाज़ में उसे कहा, ‘जाओ, पीछे जाओ, बच्चा सँभालो। ’ उसने मेरी बात चुपचाप मान ली, वह यंत्रवत उठी और पीछे चली गई। उसकी आँखों में शून्य फैला था, वह आघात से सुन्न थी, वह उस पल भीड़ में नंगे कर दिए जाने पर भी मूर्तिवत रहती…वह आत्मा से ही बेहोश हो गई थी। मैं ने बैक व्यू मिरर ठीक किया तो देखा बच्चा चुप है, वह टी – शर्ट उठा कर बच्चे की हिचकियाँ रोकने की कोशिश कर रही थी, किंतु दोनों के कोमल मनों में हिचकियाँ गहरे पैठी थीं। कभी वह बच्चा हिचकी लेता तो कभी माँ लड़की! लड़की की आँखों का काजल फैल गया था।  घुँघराले बालों का जूड़ा खुल गया था।  पीछे की सीट पर वह आलथी – पालथी मारे बैठी थी, आँखें बन्द कर, सर टिका कर।  बच्चा दूध पीते में आवाज़ कर रहा था, बीच में हिचकियाँ थीं, दोनों की।

आज से पहले नहीं जानता था कि यह लड़की हमारे बगल वाले कॉलेज में अँग्रेज़ी पढ़ाती होगी। अब इसे जानता हूँ, नाम भी जानता हूँ, मगर लड़की कहने दें। नाम जानकर क्या करेंगे, ख़ा म ख़ाँ? माना यह शहर बड़ा है, पर फिर भी लड़की छोटे शहर की है, भावुक और सहज विश्वास करने वाली।  हमारे युनिवर्सिटी में मित्र के रसूख के चलते इसका अपॉइंटमेंट परमानेंट हुआ है, सरकारी छोटा घर भी मिल गया है। हमारे मित्र के शहर की ही हैं, वे सी ई ओ हैं, किसी न्यूज़ चैनल के? किस के? जाने दीजिए न!  फ्रैजाइल  मसला है। बात इस कदर गंभीर होकर उलझ जाएगी, किसने सोचा था?

देखिए, सुबह कुछ हल लेकर आई हो। मैंने अख़बार पलटा,  मसलन हल अख़बार में छपा हो…किसी क्रॉसवर्ड में या सूडोकू में।  बच्चा दूध पीते – पीते सो गया, बॉटल मुँह से छूट गई, और दूध बह-बह कर सिरहाना गीला कर चुका था। सोफ़े पर दूध का गहरा धब्बा था। टॉवेल से पौंछा मगर दूध भीतर जज़्ब हो चुका था। बच्चा नींद में मुस्काया। बच्चा साँवला था, मित्र की तरह ऊँचा ललाट, लम्बा चेहरा, गोल होंठ लेकिन क्यूट। मैं टॉवल से दूध पौंछ ही रहा था कि वह बाहर आ गई… मैंने दूध के धब्बे पर जल्दी से कुशन रख दिया। उसने ग़ौर नहीं किया। उसके हाथ में चाय के दो बड़े काले मग्स थे, जिनपर लव कोट्स लिखी थीं। गुलाबी दिल बने थे। धुला – धुला, गोरा – गोरा मुँह लिए मेरे सामने बैठ गई। रात लगे चाँटे की तीन उँगलियाँ जो गाल पर छपी थीं, धुँधला गईं थीं।

‘आप परेशान हुए, उनके इस फ़ैमिली ऑपेरा में?” वह मुस्काई, मैं मुस्कुरा न सका।

‘मेरी एक फ़्रेंड हँसती है, कि तू सीरियल्स जैसी लाईफ़ जी रही है। तेरी ज़िन्दगी पर सीरियल बनना चाहिए।”

अब मैं सायास मुस्कुराया।

‘आप घर जाईए अब, सब सेफ़ है। अब ऐसे ही चलेगा,’ उसने कहा, मैं चुप रहा।

‘वह निर्णय मेरा ही था, इसे पालने का…’

‘डोंट एक्सप्लेन प्लीज़’ अब मैं खीज गया, पता नहीं किस पर। एक नपुंसक गुस्सा उभरा, मित्र पर, इस लड़की पर, उसकी पत्नी पर…न जाने किस पर, शायद स्थितियों पर। मैं उठ कर घर आ गया ! घर?

उसी रात उसने, वाया मेरे मित्र की वॉल मुझे एक सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट पर ‘फ़्रेंड रिक्वेस्ट’ भेजी। मैं हैरान नहीं हुआ कि उसका नाम एक फूल पर रखा गया था। सुगंधित फूल! चलो ‘केतकी’ मान लो। उस दिन उसका स्टेटस कुछ यूँ था,‘ प्रेम! हज़ारों रैपर्स खोल कर प्याज़ के छिलकों की तरह …किसी का बनाया एप्रिल फूल।’

ह्म्म ! बड़ी मार्के की बात कह गई लड़की! मैंने लाईक कर दिया।  मुझे लगा कि अब वह सँभल रही है।

कुछ ही दिन बीते थे उस हादसे को कि मित्र मेरे कॉलेज आ गए। वे भीतर नहीं आए, मुझे पार्किंग में बुलाया, मुझ पर आग्रह थोपा गया कि ‘यह कुछ सामान है उसका…बच्चे की प्रॉम और कुछ कपड़ा। तुम दे आना। और किसे भेजूँ? तुम्हारे लिए तो कैम्पस की ही बात है।’

“यार चपरासी से भिजवा दो न सामान…”

“चपरासी….तुम जानते तो हो।”

“मुझे उन दोनों को देखकर डिप्रेशन होता है।”

“मेरी सोची है कभी? मेरा क्या हाल होता है उन दोनों को देख कर? ” मैं मित्र को देख कर समझ न सका कि यह अभिनय था कि वाक़ई….

कुछ दिनों टालने के बाद, मैं सामान उठा कर लड़की के घर देने गया। डोर बेल बजाने पर आया ने दरवाज़ा खोला।  बच्चा कार्पेट पर खेल रहा था।  बच्चा खुश लगा, वह घुटनों के बल चल कर आया और मेरी पेंट पकड़ कर खड़ा हो गया। एक किलकारी मारी! मैंने उसे गोद में उठा कर उछाल दिया। वह स्टडी से बाहर आ गई, “अरे आप! अच्छा हुआ आप आए…मैं सोच ही रही थी कि कैसे शुक्रिया…” ।

“शुक्रिया, तो इन्होंने कहा न…” मैंने बच्चे को फिर उछाल दिया। वह बहुत ख़ुश हुआ। उसने मेरे कंधे पर लाड़ से सिर रख दिया। मैं बहुत सख़्त , इकलखोर इंसान था, नितांत जर्क (Jerk) और गर्क क़िस्म का अदमी। आर्टिस्टनुमा ज़ूलॉजिस्ट, लेखकनुमा… प्रोफ़ेसर। न जाने कब से तय कर चुका था कि भावुकता एक बकवास चीज़ है। इस पलने….स्साले कोमल कर दिया।

“फ़ेसबुक पर बड़ी एक्टिव हो!”

“बस ऐसे ही और क्या करूँ खाली समय में…?”

“कोई हॉबी ! फ़ोटोग्राफ़ी ! फ़ेसबुक तो भयानक लत बनती जा रही है। “

“हाँ ……… इसे देखो कितना खुश है।” उसने बात बदली। बच्चा मेरी गोद में सच मॆं किलक रहा था।

“इसे ‘मेल प्रेज़ेंस’ सिक्योर करती है। कोई फ़ादरली प्रेज़ेंस। आप आते रहा करिए, ” उसकी आवाज़ में ऎसी संक्रामक उदासी थी कि मेरे कान उदास हो गए। एक मैं भी तो हूँ…. जिसे अपने बच्चे की अनुपस्थिति इनसिक्योर करती है, जिसकी कस्टडी मैं खो चुका हूँ। मेरा बहुत मन किया कि उससे पूछूँ – ‘और तुम्हें?’ फिर मन ही ने कहा ‘क्या फ़ायदा!’

फिर मन ही बोला – “साले इस फ़ायदे का फ़ायदा?’

मैं कॉलेज से लौट कर, किसी – किसी शाम पैदल घूमते हुए उसके घर जाता था, बच्चे से खेलता चुपचाप, जब बच्चा सोने लगता, मैं लौट आता। कभी -कभी हम कॉफ़ी के बाद उसके सरकारी बरामदे में सिगरेट पीते थे, जहाँ उसके धर्मभीरु पड़ोसी उसके बारे में फुसफुसा कर अटपटी बातें किया करते थे, हम किताबें बाँटते। फिल्म्स साथ देखते। इस लड़की ने हर मुलाकात में चकित किया। वह बहुत अजीब लोगों को पढ़ती थी, ज़्यादातर उन लोगों को जो लिखते हुए युवा ही मर गए। प्रेम करते हुए, युद्ध में लड़ते या बीमारी से….मजाज़, राजकमल चौधरी, ऐन फ़्रैंक, काफ़्का, सिल्विया प्लाथ, रेम्बाँ, एलेन पॉ, बैल जार पढ़ते देख मैं चौंका था…. वह अजीब संगीत सुनती थी जिनमें इंद्रियों की अतृप्त इच्छाएँ गूँजती थीं। दुख का चीत्कार। भव्य कराह ! चकित ही नहीं, मैं चिंतित होने लगा था। मुझे लगा यह लड़की आत्मघात की तरफ न बढ़ चले, मुझे बच्चे की चिंता थी। उस दिन उसके इस फेसबुक स्टेटस ने बहुत चिंतित कर दिया. – इफ यू लव समवन ..सेट हर फ़्री इफ़ शी कम्स बैक ‘मेक हर ब्लीड’ और उन पंक्तियों के साथ एक उदास स्माईली बना था। मैंने ‘लाईक’ नहीं किया। बहुतों ने किया।  मित्र ने भी लाईक किया, मानो वह यूँ ही लिखा गया कोई जुमला था।

एक सर्दियों की दोपहर हम युनिवर्सिटी के बगल में पुराने खण्डहरों में दो अगल – बगल बनी छोटी दीवारों पर बैठे थे। बीच में हमारे धूप की नहर थी।  वह कुछ स्पष्ट थी, कुछ अस्पष्ट, हम चुप थे। वह अपनी चुप्पी में डूब मेरी सुनाई कुछ अफ़्रीकी लोक कथाओं के सन्दर्भ को बूझ रही थी।

फिर वह अचानक ही बताने लगी। “उनकी पत्नी की भी क्या ग़लती है? कोई भी ऐसे करता…. शायद मैं भी! मुझे याद है, पहली बार जब मैं इनके ऑफ़िस गई थी, अपनी सिफ़ारिश के लिए। पीछे उनकी पत्नी फ़ोटो  में मुस्कुरा रही थीं, बुकशेल्फ में और कम्प्यूटर डेस्क पर। मुझे लगा, बहुत प्रेम करते होंगे पत्नी से। कहते भी रहे कि – हाँ मैं बहुत प्रेम करता हूँ। जानती हो, तुमने आकर मुझे इस जीवन में यह महसूस करवाया कि क्या नहीं था और कहाँ खाली था मैं! शुरु ही क्यों हुआ यह सब? दरअसल, मैंने थैंक्स कहने के लिए उन्हें कॉल किया। फिर एक दो इनकी कॉल्स आईं। वो हैलो और गुडबाय कॉल्स लम्बी कॉल्स में बदलीं, स्माईलीज़ वाले टैक्स्ट मैसेज बदले आई अडोर यू, मिस यू में, फिर आई लव यू आई वांट यू में…..मैं न कहना चाहती थी, मगर एक दिन मुझे इन्होंने डिनर पर बुलाया, मुझे तनाव हो गया था जब मैंने इन्हें रेस्तराँ में घुसते देखा। मेरे मन में उनके सफल दाम्पत्य की छवि थी।

मैं खाना खाकर अपने पी. जी होम जाना चाहती थी। मैं रेड वाईन को दोष नहीं दूँगी। उसकी तमाम एरोगेंस के बावजूद एक चार्म था उसमें ! डू आई फ़ील गिल्टी? यस ! डू आई फ़ील लाईक होम रैकर? हाँ मैं क्या बन गई हूँ? घर तोड़ू !” बता कर वह एक दम हताश हो गई। मुझे उसकी यह कहानी इस शहर में रह रही, कॉर्पोरेट की दुनिया में, मीडिया में काम कर रही हर पच्चीसवीं लड़की की कहानी लगी। माईनस बच्चा ! बच्चा पैदा कर लेना तो हद ही है! या शायद कुछ अलग! कुछ हिम्मती! या नितांत मूर्खतापूर्ण।

उस शाम वह सब कुछ बता देने के मूड में थी।  उसी बरामदे में सिगरेट पीते हुए उसने बताया –

“मैंने सिगरेट पीना तब शुरु किया जब लोग छोड़ देते हैं।”

“कब?”

“प्रेगनेंट होने पर !”

“पागल हो?”

“हाँ, पहले मुझे लगा था कि प्रेगनेंसी उसे मेरे करीब ले आएगी, मगर वह तो एकदम छिटक गया था।”

 ”तुम्हें बच्चे का ख्याल नहीं आया?”

“हाँ, एकदम सच कहूँ तो वह जब तक भीतर रहा, मुझे उससे कोई लगाव न हुआ, जैसे ही बाहर आया मुझे उससे अटूट लगाव हो गया हो ऎसा भी नहीं था, वह तो बिना रोए इस संसार में आया, चप – चप करता हुआ, स्पर्श और दूध का भूखा! और नर्स जब उसे मेरे पास लाई, उसने अपना मुलायम साँवला चेहरा मेरे पेट से सटा दिया था, ऊपर उठाते ही, उसने आगे बढ़ा कर अपने नन्हे भूरे होठ, मेरे ब्रेस्ट्स पर लगा दिए…मुझे आश्चर्य हुआ, यह इसने कब और कहाँ सीखा? मैं उठने लगी तो डर कर उसने मेरी हथेली पकड़ ली….मैं चकित थी ! यह कैसे जानता है मुझे? मैं इस नन्हे लड़के के प्रेम में पड़ गई…मुझे लगा कि अब मुझे उस व्यक्ति की ज़रूरत नहीं रहेगी। यह मैंने बाद में जाना कि इसके चलते मुझे उस व्यक्ति की और ज़्यादा जरूरत पड़ने लगी है। यह खुश होता है…उसके आते ही…. वह गोद में लेता है तो उसके कन्धे से लगते ही बहुत गहरी सुरक्षित नींद सो जाता है। मैं बहुत अटपटा महसूस करती हूँ। ग़ुस्सा आता है। मन करता है, इन्हें आपस में दूर रखूँ पर…”

“फिर अब भी सिगरेट ..”

“नहीं ! अब कभी – कभी बहुत परेशान होने पर। या खुश होने पर, आपके आने पर…” वह मुस्कुराई, और एक गाल में गढ़ा पड़ गया।

हम बात ही कर रहे थे कि वह अचानक बैठे – बैठे मर गई, जड़ हो गई। संशय और निर्णय के बीच! मित्र की गाड़ी का हॉर्न बजा था, मित्र की आहट के नीचे से पुल बना कर मुझे ही आख़िर किचन के दरवाज़े से जाना पड़ा। मैंने फुसफुसा कर समझाया, “ मुझे लगा था कि अब तुम उसे भूल रही हो।”

“अरे! वह पिता है मेरे बच्चे का।“ उसके चेहरे पर अजनबियत थी मेरे प्रति, उसके लिए एक लाड़ !

“फ़िल्मी बकवास !” मैं उस पर गुर्रा कर चला आया।

अगले दिन फ़ोन पर मैंने उससे पूछा – “आर यू अफ़्रेड ऑफ़ अ बेटर लाइफ़ ? कभी सोचा कि तुम्हें क्या चाहिए अपनी ज़िन्दगी से? “मेरा संकेत लिए बिना ही वह प्रलाप करती रही – “…. मुझे नहीं मालूम इस ज़िन्दगी से क्या चाहिए..एण्ड हाउ द फ** जस्ट गोट सो फार! तुम कहते हो वक़्त बदलता है, लेकिन यह तो वैसे ही रुका हुआ है।

 मैं भी वैसे ही हूँ, थकी हुई, ठण्डे पैर लिए, अकेली और नपुंसक गुस्से से भरी । तुम्हारे दोस्त मि. वालिया जिनसे मैं प्रेम करती हूँ, आते हैं, चले जाते हैं, मैं वहीं की वहीं स्क्रीन के आगे अकेली! कब बदलेगी अजीत यह ज़िन्दगी?”

“ऎसे तो नहीं बदलेगी, यू हैव टेकन ए सीरीज़ ऑफ रॉंग डीसीज़ंस मिस ऑलवेज़ रॉंग ! कितनी अजीब बात है कि केवल तुम्हारी माँ जानती हैं कि तुम्हारा सच क्या है? और पिता और परिवार और बाकी आस – पास के लोग और कॉलेज में सोचते हैं कि तुम ऐसे रिश्ते में हो जहाँ लड़का विदेश में रहता है…जबकि सच तो यह है कि अब सब जानने लगे हैं कि… कि तुम लम्बे समय से झूठ बोल रही हो, तुम्हें अपने भाई के विवाह में बुलाया तक नहीं गया।

और तुम इस आदमी की मिस्ट्रेस…………

वह फ़ोन पर ही सकते में आ गई थी शायद। मैंने सॉरी कहकर फ़ोन रख दिया। मेरे दिमाग़ में उसकी दुबली, काँपती देह छप गई, रात भर छपी रही और मैं ग्लानि के मारे सो न सका।

एक इतवार की सुबह वही मिल गई चर्च के बाहर – “तुम कब से?…”

“मेरा धर्म सर्वधर्म! ” वह अपनी हैट के नीचे शैतानी से मुस्कुराई। उसकी गोद से बच्चे ने बाँहें बढ़ाईं और मेरी गोद में आ गया। वह कुछ कहती उससे पहले वो साँवला – सलोना बच्चा मेरा चेहरा देखते हुए बेबी टॉक करने लगा।

“गा गा गू गू…तियोडिकम” कुछ शिकायती लहज़ा। उसके गोल मुख पर हमेशा दो प्रश्नवाचक चिन्ह बनी विस्फारित काली आँखे चमक रही थीं। उसके भूरे होंठों के भीतर के गुलाबी विस्तार में उगने को आतुर सफेद अधूरी दंतपंक्ति मुझे भा गई, दूधिया लार की एक बूँद मेरी कमीज़ पर गिरी, मैंने फिर उन जनाब को अपने दोनों हाथों थाम कर सामने किया और उसकी आखों में आँखे डाल कर उत्तर दिया –

“ ओह सॉरी ! मैं बिज़ी था मेरे प्यारे! तुम जानते तो हो न ! वी मैन होल्ड वर्ल्ड ऑन अवर शोल्डर”और उसे उछाल दिया और फिर थाम लिया, जो कि उसका प्रिय खेल था मेरे साथ का।

“ एण्ड वी विमैन सिट आईडल ….नो !”  वह मेरे पास खड़े होकर एक बहुत फ़ैमिलीनुमा इमेज को पूरा करने लगी।

मैं सोच में पड़ गया था, एक हल्का भय….ज़िम्मेदारी से भागता अंतस, भीतर कहीं चेतावनी के लाल फ्लैग़्स लगाने लगा। हमने साथ बीयर पी। उस दोपहर उसने हमारे बीच के सबसे पहले ही चुम्बन से मेरा भीतर – बाहर कुछ – कुछ बदल दिया। वह चुम्बन इतना गीला और लसलसा था कि मैं जान गया था कि उसकी देह नहीं मन भूख़ा है और अकेला भी।  मैं आगे नहीं बढ़ा…खाई में एक और खाई न खोद सका। भले ही उसने मेरे इतिहास में दिलचस्पी नहीं रखी मगर मेरा भी एक इतिहास था न! हम दोनों के बीच एक बहुत पतली सी जगह थी, जिसमें न सच गुज़रता न झूठ…बस गुज़रती थीं तो बच्चे की किलकारियाँ। उस दिन बस उससे यह पूछा – क्या तुम ब्राण्ड न्यू स्टार्ट में विश्वास करती हो?

वह असमंजस में मुझे देखती रही, कुछ बोली नहीं। मैं भी सवाल पूछ कर अनिश्चितता में घिर गया। अपने बहुत प्यारे एकांत का मोह सालता रहा। “किसी भले हम उम्र व्यक्ति से शादी कर लो। इतना नेट पर बैठती हो, सैकेण्ड मेरिज डॉट कॉम…”

“सैकेण्ड मैरिज अजीत! पहली कौन सी थी?”  मैं झेंप गया। लौट आया।

मैं एक दिन मित्र के ऑफ़िस गया था, मेरी रिकॉर्डिंग थी, माईग्रेटरी बर्ड्स (अप्रवासी पक्षियों) पर एक डिस्कशन की। रिकॉर्डिंग के बाद मैं उसके कमरे में कॉफ़ी पी रहा था।  मैं अपनी तरफ से ज़िक्र नहीं चलाता मगर वह चला बैठा – “एक गलत निर्णय, कैसे बाकि ज़िन्दगी और आपके अपनों को प्रभावित कर जाता है, यार वाईफ़ बहुत डिप्रेशन में है।“

“तो छोड़ दो उसे? मुक्त करो स्वयं को और उसे भी और अपनी पत्नी को, इस तनाव से।”

पहले वह सौजन्यता बरतता रहा – “वह नहीं रह पाएगी मेरे बिना, हम सच में प्रेम करते हैं। फिर अब तो बच्चा भी है न! ” “क्या तुम खर्चा देते हो बच्चे का?”

“ नहीं वह अच्छा कमाती है, लेती नहीं है, फिर भी….उसका है कौन? भले ही दो महीने में एक बार जा पाता हूँ..”

“ तो इन्हें तलाक लेकर उससे शादी कर लो….”

“नहीं कर सकूँगा, बच्चे कॉलेज में आ गए हैं। फिर ये भी तलाक़ नहीं देंगी।”

“तो उसका गुनाह?”

“वह जानती थी कि मेरे जैसे महान व्यक्ति से प्रेम…में पीड़ा तयशुदा थी,” मैं मित्र की आत्मश्लाघा से हैरत में आ गया। उसकी मुस्कान में पानी का चमकीला साँप लसलसा रहा था।

“प्रेम तक तो ठीक है, वालिया। बच्चे के पहले नहीं सोचा था?”

“उसने ना? यही मैं कहता हूँ कि – पहले सोचना था, कुछ करना था, जैसे बड़े शहर की लड़कियाँ करती हैं।”

“फिर बच्चे का गुनाह क्या था?”

“हमने तो खूब मना किया था कि भई, भविष्य शून्य है। हमारा योगदान कुछ भी संभव न होगा। सिवाय कभी आते– जाते रहें, कभी बुलाते रहें।”

मैं संशय और निर्णय के बीच की अंकगणित भूल गया। गहरी साँस ली तो मित्र बोले – “तुम्हारा मन तो नहीं आ गया उस पर! वैसे सीढ़ियाँ बनाना ख़ूब जानती हैं आजकल की लड़कियाँ।”

“हाँ, और भूल जाती हैं कि साँप – सीढ़ी के खेल में साँप ही ज़्यादा भारी पड़ते हैं…”

“ये लो तुम भी शिकार हुए उसकी शातिर मुस्कान के, गिर गए उस कातिलाना गाल के गड्ढे में?”

मेरे मन में उस की निष्पाप मुस्कान उभर आई जिसपर एक अजगर छाया डाल रहा था। मेरा चेहरा सीमेंट हो गया।

“तुम बहुत घटिया हो वालिया ! हम दोस्त कैसे बन गए?”

“अरे ! मज़ाक कर रहा था, वही तो बता रही थी कि कैसे बड़े भाई की तरह तुमने उसे मेरा दोस्त होने के नाते सहेजा। बच्चा तुमसे हिल गया है, कन्धे से लगा रहता है, कैसे तुम अंग्रेज़ी साहित्य की किताबें शेयर करते हो, मेरातो साहित्य से दामन छूट गया, जबसे न्यूज चैनल्स के इस कॉर्पोरेट सेक्टर में आया। बड़ा स्ट्रेस है भाई! दिमाग़ ख़राब रहता है। तुम अच्छे हो वहीं, युनिवर्सिटी में ।शांति, क्रिएटिविटी, स्टूडेंट्स…. !”

“बड़ा भाई!” मुझे इस शब्द पर खीज होती रही। मैं बहुत दिन उस दिशा में नहीं गया, ख़ाँ म ख़ाँ में…. इस गुनाह– ए – बेलज़्ज़त का हिस्सा होना। फिर भी बच्चा मुझे बहुत याद आता रहा। एक बार शायद बच्चे ने मोबाईल फ़ोन से खेलते हुए नम्बर रिडायल कर दिया, मैं हलो – हलो करता रहा, “हलो अजीत हियर…” बहुत देर बाद एक आवाज़ आई, “अई….त …अंत…लोई..ईइइइ” फिर एक मीठी चिहुँक …”

उसके बाद मेरे अवचेतन ने बहुत बार प्रतीक्षा की बच्चे की ऎसी फ़ोन कॉल की, मैं फुसफुसाया फ़ोन में…कॉल मी, बेटू! मगर फ़ोन नहीं आया। इतवार गुज़रते रहे, वह भी फिर कभी चर्च के बाहर नहीं आई। शायद मित्र ने उसे बाध्य किया हो…मुझसे संपर्क न रखने को। फ़ेसबुक पर जाकर खामोश टहलता रहा। आख़िर एक दिन उसने फ़ेसबुक पर लिखा –

एक लड़की थी जो पहने थी

फटा लाल कुर्ता

उसके सीधे कन्धे पर थीं लाल खरोंचें ज़िगज़ैग

वह खेलने की, रखने की चीज़ थी

उसने पुरानी लोहे की जंग खाई चेस्टिटी बेल्ट पहनी थी

एक लड़की थी जिसने छ: शब्द लिखे

और पुरानी ज़िन्दगी को दफ़ा किया

नई के लिए, अब वह पहनेगी!

रेड कार्पेट पर लहराता, रेशमी सफेद वेल ! क्योंकि मैं ब्राण्ड न्यू स्टार्ट में विश्वास करती हूँ

मैं दम साधे अमंगल की छाया के एन नीचे, अफ़्रीकन जंगली लोककथाओं का अनुवाद करता रहा।  एक कहानी मन में अटक गई, जहाँ एक कोटर में एक घोंसला था, घोंसले में बच्चे थे और थी मादा हॉर्नबिल और नीचे से हाऊण्ड कुत्ते भौंकते रहे थे। यह कहानी अधूरी पड़ी रही।  वैसे तो प्रत्यक्षत: इस दुनिया में सब ठीक ही चल रहा था। फ़ेसबुक पर उसकी यह पोस्ट मित्र को नागवार गुज़रनी थी, गुज़री। उनकी पत्नी ने उसकी दुश्चरित्रता, पति से विवाहेतर सम्बन्ध रखने की शिकायत कर दी उसके कॉलेज के डीन से। प्रतिउत्तर में इसने उन पर उनकी मिस्ट्रेस होने और बच्चे की माँ होने के नाते कुछ अधिकारों की माँग रख दी ! मित्र – पत्नी ने न केवल सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर, मीडिया में और बाहर भी अपने पालतू हाउण्ड्स छोड़ दिए, मित्र स्वयं सौम्यता, प्रतिष्ठा, प्रायश्चित के तीन मुखौटे पहने और सात दरवाजों में पीछे जा बैठे – “ भई ग़लती किससे नहीं होती, अच्छी लड़की थी, हमारी मित्र थी। बच्चा? अच्छा वह बच्चा, हमें तो बताया था उन्होंने कि अकेलेपन के कारण उसे गोद लिया है।”

ख़ैर युनिवर्सिटी में कैंटीन, कैफ़े और नुक्कड़ों पर उनके चर्चे आम हुए। सड़कें जिन पर वह अपनी आकर्षक चाल के चलते गुलमोहरों, पलाशों को जलाती थी, अब वह उन पर चलते थरथराती, उन्हीं रास्तों पर चल कर क्लासेज़ लेनी होती थी, जिन पर लड़के और साथी टीचर्स जुमले छोड़ते और लड़कियाँ मुँह फेर कर मुस्कुरातीं। पहले वह छात्रों में लोकप्रिय थी, बाद में छात्रों का रवैय्या भी तल्ख़ और उद्दण्डता भरा हो गया, वह हताशा में, ‘टेल ऑफ़ टू सिटीज़’ पढ़ाते – पढ़ाते’ गुस्से में क्लास अधूरी छोड़ देती … बाद में उसके नाम से वॉर्निंग लैटर इश्यू होने लगे। पहले वह सहती रही मगर फिर उसे कहा गया कि वे ‘केस’ रिज़ॉल्व होने तक लम्बी छुट्टी ले लें, छात्रों का नुक़्सान हो रहा है!

मैं दूर से देखता रहा। कभी अपनी चुप्पी या भीतर की तल्खी से घबरा कर टैरेस पर आ जाती, मैं सुबह की सैर पर कैम्पस में उधर का रास्ता कम ही लेता था, बस तब, जब मॉर्निंग ग्लोरी के फूलों के चन्दोवे वाला घर मुझे बुलाता।

मुझे बच्चे की चिंता होती, ‘जिसे वह लाड़ में आकर कहती मेरा साँवला लड्डू गोपाल!’ एक दिन शाम मैं उधर से गुज़रा तो दूर से देखा, आया बच्चे को लिए खड़ी थी, बच्चा कुनमुना रहा था, खीज रहा था, दुबला हो गया था। मैं चेहरा घुमा कर गुज़र गया…बच्चे ने पुकारने के अन्दाज़ में कुछ कहा – अंतो….ल्ल्ला…ई. ‘अंकल अजीत!” मेरा मन वहीं सड़क पर बैठ कर फूट – फूट कर रोने को हुआ। मैं कुडू हिरण की तरह बड़े – बड़े डग भरता हुआ बहुत दूर आ गया….

मैं उन दिनों अपनी अफ़्रीकन लोक – वन्य कथाओं की आख़िरी कहानी टोकस ( यलो बिल्ड होर्न बिल ) और उस पर वैज्ञानिक पहलुओं की पड़ताल के साथ पूरी करने में जुटा था….मैं आख़िरी ड्राफ़्ट का आख़िरी पैरा टायप कर रहा था, “ बोस्तवाना के जंगलों में मिलने वाला यह पक्षी, अपनी मादा को माँ बनने के दौरान सुरक्षा के लिए कोटर में बन्द कर देता है, बाहर से कोटर को गीली मिट्टी और लार से सील कर देता है, बस चोंच निकलने लायक जगह छोड़ता है, अन्दर टोकस मादा माँ अपने सारे पंख गिरा कर बच्चों के लिए गुदगुदा बिस्तर बना देती है, और वह स्वयं बिना पंख की देह के साथ अण्डे सेती है, नर उसे बाहर से खाना सप्लाई करता रहता है, तब तक जब तक कि बच्चे अण्डे से निकल कर उड़ने लायक नहीं हो जाते और मादा के पंख वापस नहीं आ जाते। आप जानते हैं इस व्यवस्था में सबसे ज़्यादा जान की कीमत किस की है? माँ की…बिना पंख? न! अण्डे – बच्चों की !

नहीं!…उस नर की ! क्योंकि अगर वह नर टोकस बाहर किसी शिकारी चिड़िया, साँप , बिल्लियों का शिकार हुआ तो मादा और बच्चे तो स्वयं ही कोटर के भीतर – भीतर भूखे औए बिना पंख के…मर जाएँगे ना! “ तभी आधी रात मेरे फोन पर उसका ‘स्टेटस अपडेट’ अलर्ट चमका।

“कोई सुन रहा है? मैंने खुद अपना हाऊस अरेस्ट कर लिया है, मि. राईट योर मिस आलवेज़ रॉंग …ग़लत लिखने वाली, ग़लत रोने वाली, ग़लत तरफ़ से तलवार चलाने वाली, जो खैरख्वाहों का क़त्ल करे, और दुश्मनों को चूमे।

सुनो, आज यह मिस ऑलवेज़ रॉंग एक नई लड़ाई में मुब्तिला है, खुद से लड़ाई! मैं अपने माता – पिता को सच बताना चाहती हूँ। मैं आदतन फिर से स्क्रीन पर हूँ।  बहुत से लोग मेरे आख़िरी शब्द पढेंगे, जो कि फिर अफवाह बनेंगे, क्योंकि वे नहीं समझेंगे कि ये किसके लिए थे। कोई नहीं समझेगा।”

 कैसे बेतरतीब शब्द थे, लड़खड़ाते …..टूटते, ज़िंदगी से दूर भागते पलायनवादी शब्द !

मैं कहानी ख़त्म करते ही भागा। मैं जान गया था कि मुझे यहीं उसके आस – पास जीवंत रहना था।  मुझे लौटना था…..उसकी कोटर की ओर ! मैं नर टोकस की – सी मुस्तैदी के साथ लगभग उड़ान भरता हुआ उसके घर पहुँचा, आधी रात! मुख्य दरवाज़े पर बाहर से ताला लगा था।  मैंने घंटी बजाई, भीतर थी वह ! उसने रसोई वाला दरवाज़ा खोला। उसे देख मुझे याद आई मादा टोकस बिना पंख, काँपती – उसकी गोद में बच्चा रो रहा था, बुखार में था !

उसकी काली भँवरों सी आँखें सूज कर बन्द हो गई थीं।

मैं कई दिन लगातार छुपकर जाता रहा। रात होते ही उसे ज़रूरत की चीज़ें, दवाएँ और कानूनी सलाह पहुँचाता।

बच्चा ठीक हो गया, केस भी लगभग दोनों ओर से रिज़ॉल्व हो गया, तो एक दिन मैं किचन की खिड़की से फुसफुसाया – क्या तुम्हें सच्चे प्रेम से एलर्जी है? उसने चाबी बाहर फेंक दी। मैं मुख्य दरवाज़े से भीतर गया। उसके बाल लम्बे हो गए थे, और मुझे वह बच्ची नहीं लगी। एक भरी पूरी औरत ! मजबूत और दृढ़ ! बच्चा भी थोड़ा बड़ा हो गया था। बोला हुआ दोहराता था। कुछ क़दम चलता था और बैठ जाता था।  खाना खाकर जब हम बरामदे में सिगरेट पीने बैठे, तो मैं बोला –

“तुम्हारे पंख लौट आए, श्रीमति यलो बिल्ड हॉर्न बिल?” वह मुस्कुराई, “किसी ट्रांस में हो? क्या?”

“किताब लिख रहा था, बच्चों के लिए अफ़्रीका के जंगलों की मिथक और सत्य वन्य जीवों की कथाएँ।”

“अरे! तुम्हारी बात से याद आया…परसों रात, अजब वाक़या हुआ।“

“क्या?”

“तुम जानते हो न, इन बुरे और ‘कफसीले’ (कफस के सीले दिनों के लिए मेरा शब्द) दिनों के लिए मैं बच्चे के लिए ख़ूबसूरत कॉमिक चित्रों वाली किताब लाई थी। उसमें प्यारे – से इलेस्ट्रेशन्स वाली कहानियाँ थीं।  उसमें एक कहानी थी मि. वॉलरस। मैं इसे चित्र दिखाते हुए सुनाती थी हर रात…एक कहानी !”

“हाँ, तो?”

“वह रोज़ एक ख़ास कहानी पर ज़रूर जा अटकता था, बार – बार पन्ना पलट कर देखता। उस कहानी में एक वॉलरस महाशय होते हैं। जो समुद्र किनारे घूमते – घामते घोंघों की कॉलोनी में पहुँच जाते हैं। घोंघे इतनी संख्या में होते हैं और आपस में लसलसे पदार्थ से जुड़े होते हैं कि उन्हें यूँ खाना मुश्किल होता है। मि. वॉलरस घोंघों को ये जताते हैं कि वे बहुत बड़े महान हैं, उनके हाथ में बहुत से अवसर हैं। वे बहुत से समुद्री जीवों का भला कर चुके हैं।

युवा घोंघे बहुत प्रभावित होते हैं, तो वे कहते हैं मेरे साथ समुद्र तट पर घूमने चलो, देखो दुनिया कितनी बड़ी है। बड़ी उम्र के घोंघे तो नहीं जाते, युवा घोंघे चल देते हैं….आगे जाकर वे एक चट्टान पर बैठ कर उन्हें ज्ञान देने की मुद्रा में बैठते हैं और एक – एक पंक्ति घोंघों की खाते जाते हैं। इस कहानी में खूब रिदम और राईम थी, चित्र बहुत आकर्षक थे सो यह कहानी तो क्या सुनता था मगर चित्र देख कर – गो — गो….मि. वॉलरस कहता था तुतला –तुतला कर।”

“फिर?”

“परसों वालिया भी आया था…इसी किचन के दरवाज़े से, अपना मौखिक माफ़ीनामा लिए, मैं किचन ही में उससे बात कर रही थी, तभी यह अपना वॉकर चलाते हुए मेरे पीछे आ गया और उसे देखते ही चीखा…. “गो गो मि. वॉलरस ! गो मि. वॉलरस !”

“अरे! अजीब बात है यह तो, कहाँ है वह किताब…?”

“भीतर, वहाँ उसके सरहाने….”

हम अन्दर आ गए। वह कॉमिक चित्र देखते ही मैं मुस्कुरा दिया….हल्के आगे को दाँत और उन पर मूँछों के छत्ते वाला वह स्थूल जीव…कोट पैंट पहने हुए, लिजलिजे, मूर्ख घोंघों की पंक्ति के आगे विनम्र हाथ बाँधे खड़ा था…

“हम्म! मि. वॉलरस ! हा – हा मि. वॉलरस ! ” मैंने उसे छेड़ कर नींद से ही जगा लिया और उसे उछाल दिया…फिर थाम लिया। वह भी खिलखिलाया….अंतल…अदित..अंतल ओई…..!!!

कहानी, उपन्यास और कथेतर में सामान गति रखने वाली मनीषा कुलश्रेष्ठ गहन विषयों और नए शिल्पों के लिए जानी जाती हैं। ‘स्वप्नपाश’ की स्कीजोफ़्रेनिक नायिका हो या भारतेंदु की प्रेयसी ‘मल्लिका’ , मनीषा कुलश्रेष्ठ का रचना जगत् कल्पना और शोध से समृद्ध, अनूठे प्रसंगों से परिपूर्ण है। उनके पास रोचक और रचनाशील के संगम पर गढ़ने का फ़न है। हाल ही में मनीषा कुलश्रेष्ठ को बिरला पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

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