प्रतिशोध

सुशांत धर

विजय और रूफ़ बचपन के दोस्त थे और अपने स्कूल की क्रिकेट टीम के चहेते भी उनका रोल नंबर अगर एक और दो था तो यह कोई संयोग की बात नहीं थी। दक्षिण कश्मीर के एक छोटे, सुहाने-से गाँव छत्तापुरा में वितस्ता के किनारे उनका स्कूल था इस गाँव के घरों और गलियों में आज भी उन लोगों के निशान बसे हुए थे, जो कभी यहाँ फले-फूले थे। गाँव के सामने के पहाड़ों के ठीक पीछे दो नदियाँ मिलती थीं, जिनके असर से पूरी घाटी आबाद थी।

पंडितों के कश्मीर घाटी से निकलने के 21 साल बाद आशा बुदबुदाई, “कब ये देशनिकाला ख़त्म होगा? कब हम घर वापस जाएँगे? किधर गया हमें बचाने वाला? जो कुछ उन्होंने हमारे साथ किया, भगवान उन्हें बख्शेगा नहीं।” उसके ख़यालों में यारबल घूम गया, वितस्ता का किनारा। और उसका बड़ा बेटा रमेश। रमेश की अस्थियाँ वहीं वितस्ता में बहाई गई थीं।

जब आशा ने कश्मीर का अपना घर छोड़ा था, वो हाल में पैदा हुई बछड़ी को अपने साथ ले जाना चाहती थी। उसे बछड़ी की जान की फ़िक्र थी। झुक कर आशा ने उसका माथा चूमा और रसूल खान के हवाले कर दिया। कहा था कि इसे सलामती से रखना, मैं इसके लिए वापस आऊँगी। उसने रसूल खान के हाथ जोड़े कि इसे ठीक से खिलाएँ-पिलाएँ। कुछ पैसे रसूल खान को थमाकर वो भीगी आँखें लिए निकल गई थी। बछड़ी आशा के पीछे भागी थी। उसने कोशिश भी की थी उस ट्रक पर चढ़ने की जो आशा के परिवार को लिए जा रहा था।

महीने भर बाद जब आशा को पता चला कि बछड़ी को काट दिया गया, वो रसूल खान पर बहुत बिगड़ी थी। वो सारा दिन रोते गुज़रा था उसका।

इस कहानी को सुनाने वाले भी इसी देशनिकाले में चल बसे। 1998 में। उनका नाम था व्याद काक। वे लघुकथाएँ लिखा करते थे। शादी नहीं की थी उन्होंने। उनका कोई परिवार नहीं था। 1947 के कबाइली हमले में उनके माता-पिता मारे गए थे। तब के बाद ये उनका दूसरा देशनिकाला था। इसने बड़ा दुख दिया था उन्हें। इस बार के देशनिकाले में वो अपनी याद्दाश्त खो बैठे थे। व्याद काक बिशंभर नाथ के परिवार के क़रीबी थे। जब वो मरे, तो उनके कमरे में रखी किताबें कैंप में रहने वाले बच्चों में बाँट दी गईं। मेरे पास उनका भग्वद्गीता का पुराना संस्कृत संस्करण आज भी रखा है। किताब के पहले पन्ने पर लिखा है, वी.के 1939। इस किताब में मुझे उनकी दसवीं की मार्कशीट दबी मिली। इस पर लिखा है:

यूनिवर्सिटी ऑफ जम्मू एंड कश्मीर

व्याद काक

फ़र्स्ट डिविज़न

1950

घड़ी में साढ़े नौ बज रहे थे। टेप रिकॉर्डर पर एक पुराना गाना बज रहा था, ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?’ रानी जल्दी सो गई थी। आशा खाना बना रही थी। बिशंभर नाथ किसी काम के चलते पास के गाँव में गए हुए थे। विजय और उसका बड़ा भाई रमेश ताश खेल रहे थे। रमेश ने उठकर खिड़की से बाहर देखा। कुछ आदमी बाहर खड़े हँस रहे थे। खिड़की पर से कोई साया गुज़रा और नीचे हँसी की आवाज़ तेज़ हो गई। बूट पहने पाँवों के ठकठकाने की आवाज़ सुनाई देने लगी। ज़ोर-ज़ोर से पीटने की वजह से घर का मुख्य दरवाज़ा तीखी आवाज़ करता हुआ खुल गया था। फेरन पहने हुए कई लोग घर में घुस आए। कुछ के चेहरे ढके हुए थे। “बिशंभर नाथ कहाँ है? कहाँ है वो धोखेबाज़? किधर है वो कमीना?” वो लोग दो मिनट तक चिल्लाते रहे। उनमें से दो, खिड़की पर बैठे बंदूक़ें लहरा रहे थे। विजय कमरे के एक कोने में सिकुड़ कर बैठा हुआ था। रमेश डर से काँप रहा था। उनमें से एक आदमी सीधे रसोई में घुसा चला आया। “यहाँ क्या कर रहे हो तुम? क्या चाहिए तुम्हें? हमने क्या ग़लत किया है? तुम लोग क्या करने वाले हो हमारे साथ?” आशा पागलों की तरह चीख़ पड़ी थी। वो एक कमरे से दूसरे कमरे की तरफ दौड़ रही थी। विजय और रमेश को इनके सामने पड़ने से बचाना ज़रूरी था। एक कमरे में रानी को सोते देखा तो उसने जल्दी से कमरे की कुंडी चढ़ा दी। उधर पूरे परिवार को तमाम तरह के अपशब्दों से नवाज़ते हुए मिलिटेंटों ने पूरा घर छान मारा था। आशा दौड़कर कमांडर के पास गई और उससे बूट उतारने की मिन्नतें करने लगी। वो पूरे घर में बूट लेकर घूम चुका था और अब उस कमरे में जा रहा था जहाँ छोटा-सा मंदिर बना हुआ था। आशा ने उनमें से एक को गिरेबान पकड़ कर रोक दिया। एक आदमी ने उस कमरे का दरवाज़ा पीटते हुए उसे तोड़कर खोल दिया, जहाँ रानी सोई हुई थी। रानी जाग गई और चिल्लाती हुई कमरे से भागी। वो इन घुसपैठियों को गाली दे रही थी। वो बेहोश हो गई और काँगड़ी उसके हाथ से फिसल कर गिर गई। वो लोग घर की तलाशी लेते रहे। आशा ने मदद के लिए खिड़की से बाहर की तरफ आवाज़ लगाई। बाहर, घरों की बत्तियाँ बुझती चली गईं। किसी ने नहीं सुना। पड़ोसी घरों में से कोई भी बाहर नहीं निकला। “तुम्हारे पति का नाम लिस्ट में है। हमें चाहिए अब वो,” घुसपैठिए चिल्ला रहे थे। भागदौड़ में कमांडर का नक़ाब उसके चेहरे से फिसल गया। उसके चेहरे को घूरते हुए आशा चिल्लाई, “मैंने कहीं देखा है तुम्हें।” आशा ने उसे पहचान लिया। वो हामिद था। विजय के साथ पढ़ता था। वो स्कूल छोड़ कर ग़ायब हो गया था। सुना था कि वो जिहादी बनने के लिए पाकिस्तान गया है।

“हम दोबारा आएँगे। हम उसे छोड़ेंगे नहीं…”

बिशंभर नाथ बच गए। मौत एकदम क़रीब से गुज़र गई थी। उस भयानक दिन वे होगुम में ही रुक गए थे। रहमान ने उन्हें रोक कर आगाह कर दिया था कि वे आज घर न जाएँ। रहमान ने उन्हें बचा लिया, एक नई ज़िंदगी दे दी। बिशंभर नाथ उस रात ज़रा भी नहीं सोए। वे अपने परिवार के लिए डरते रहे थे। वो उनकी सलामती के लिए परेशान थे। जब वे घर पहुँचे, तो सब के सब रोने लगे। सबको लगा था कि उन्हें मार दिया गया है। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। दिन बीत गया और शाम अंधेरे में समा गई। उन्होंने एक दूसरे को गले लगाया और एक कमरे में सिमट गए। विजय एक हफ़्ते तक स्कूल नहीं गया। रमेश डर से काँपता रहा। परिवार ने तय कर लिया कि कुछ दिनों में यहाँ से निकल जाना है। बिशंभर नाथ को दफ़्तर से कुछ काग़ज़ चाहिए थे। उन्होंने कुछ सामान अपने साथ बाँध लिया।

जिस दिन परिवार गाँव छोड़ने वाला था, उससे एक दिन पहले क़ातिलों ने पूरे गाँव को घेर लिया। उन्होंने रमेश के लिए आवाज़ लगाई। रमेश गाँव में ही एक कैमिस्ट की दुकान पर काम करता था। सारा गाँव डर में डूब गया। रमेश को दुकान से उठवा लिया गया। उसके हाथ बाँध दिए गए थे। आँखों पर पट्टी बाँध कर उसे एक नाव पर ले जाया गया। उसे बूटों और बंदूक़ की बटों से इतना मारा गया कि उसका चेहरा पहचानना मुश्किल था। उसके बदन को सिगरेट से जलाया गया। उसकी आँखें बाहर निकाल दी गई थीं। क़ातिल उसे गाँव के खेल के मैदान में, चिनार के पेड़ तले खींच कर लाए। रमेश ज़िंदगी की भीख माँगते-माँगते बेहोश हो गया। क़ातिलों ने उसके ऊपर पेशाब किया और फिर उसे गोली मार दी। उसकी लाश को नदी में फेंक दिया गया। अगले दिन लाश बाहर निकाली गई।

बिशंभर नाथ का परिवार दुख के दरिया में डूब गया था। व्याद काक ने उनके लिए पूरी व्यवस्था की। अंतिम क्रिया करने के लिए वही पंडित को लेकर आए। विजय अपने खुद के घर से लकड़ी लाया। आशा और रानी बरामदे में बैठकर बेतहाशा रोते, सिसकते रहे। क़त्ल की खबर बाकी गाँवों तक फैल गई थी। विजय कमरे के कोने में छुपा हुआ अपने भाई के लिए रोता रहा। गाँव से कोई नहीं आया। विजय का दोस्त रूफ़ अंतिम संस्कार के लिए आया था। उसने विजय को सांत्वना दी। चिता में आग दिए जाने के बाद, रूफ़ ने विजय के पास आकर उसके कान में धीरे से कहा, “विजय, मेरी बात सुनो, ये लोग अल्लाह के रास्ते पर हैं। ये लोग मासूमों को नहीं मारते। बिना वजह नहीं मारते ये किसी को। रमेश ने ज़रूर कुछ ग़लत किया होगा। क्या पता वो मुख़बिर हो? रोओ मत। मैं अल्लाह से सलामती के लिए दुआ करुँगा।” रूफ़ चला गया पर विजय हैरान खड़ा था। उसके पैर काँप रहे थे। उन शब्दों ने विजय को अपनी गिरफ़्त में ले लिया था। उन्होंने कभी उसका पीछा नहीं छोड़ा। वो उसे बार-बार परेशान करते रहे। अगले दिन, जैसा कि पहले ही तय किया गया था, इस परिवार ने गाँव छोड़ दिया। वो लोग एक नई जगह पहुँच कर शरणार्थी शिविरों में रहने लगे। गाँव में हालात और ख़राब हो गए। गुमनाम आदमियों ने उनका घर जला दिया था। किसी ने ये ख़बर बिशंभर नाथ तक पहुँचा दी। इस वाकए के बाद उन्होंने अपनी जायदाद एक पड़ोसी को बेचने का फ़ैसला कर दिया, जो अक़्सर जम्मू के शरणार्थी शिविर के चक्कर लगाता था। विजय ने आगे पढ़ाई नहीं की। उसने किसी से भी बात करना लगभग बंद कर दिया था। कुछ था जो उसे परेशान कर रहा था। वो कभी चैन से सो नहीं पाया। रानी को दौरा पड़ा और वो बिस्तर से लग गई।

कई साल बाद विजय ने किसी से सुना कि रूफ़ के पिता को मिलिटेंट्स ने मार दिया था। विजय ने तय किया कि वो अपने पुराने गाँव जाएगा। परिवार ने काफ़ी मना किया। पर इतने सालों से वो अपने दिल में कुछ लिए घूम रहा था, कुछ ऐसा जो उसे उदास किए था। वो अहसास और सदमे के तूफ़ान में कहीं फँसा था। विजय जाने की ज़िद करता रहा। जहाँ जाने की वो बात कर रहा था, वहाँ बस मार-काट और ख़ून-ख़राबा था। एक बिरादरी दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ी हुई थी। हर कोई एक दूसरे को शक की निगाह से देख रहा था। विजय ने रात में सफ़र किया और सुबह अपने गाँव पहुँच गया। वो सीधे रूफ़ के पिता के जनाज़े में पहुँचा। रूफ़ ने विजय को दूर खड़े देख लिया। क़ब्रिस्तान में लोगों का हुज़ूम उमड़ा हुआ था। रूफ़ की आँखों में आँसू उतर आए। वो सीधे विजय के पास पहुँचा और उसके गले लग गया। वो ज़ोर से रोया और बोलो, “देखो विजय, देखो उन्होंने मेरे पिता के साथ क्या किया?” विजय ने रूफ़ के गिर्द अपनी बाँह डाली और उसके कान में कहा, ‘ रूफ़, मेरी बात सुनो, ये लोग अल्लाह के रास्ते पर हैं। ये लोग मासूमों को नहीं मारते। बिना वजह नहीं मारते ये किसी को। तुम्हारे पिता ने ज़रूर कुछ ग़लत किया होगा। क्या पता वो मुख़बिर हों? रोओ मत। मैं भगवान से सलामती के लिए दुआ करुँगा।’ रूफ़ सकते में था, वो डर गया था। वो हैरान खड़ा रहा, और फिर अपने घुटनों पर गिर कर रो दिया।

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