जनता छाप इंटेलेक्चुअलता का लेखक

प्रभात रंजन

‘इंटेलेक्चुअलता’, अमृतलाल नागर का दिया हुआ शब्द है। जोशी जी उन्हें अपना पहला कथा गुरु मानते थे। मुझे याद है कि शुरुआती मुलाक़ात में ही उन्होंने बताया था कि वे एक कहानी लिख रहे थे जिसका शीर्षक था ‘टचवुड’। कहानी एक ऐसे आदमी के बारे में थी जो इतना भाग्यशाली था कि उसे मिलने वाले देखते ही कह उठते थे- टचवुड!

उन दिनों, सच बताऊँ तो मैं पूरी तरह से उनके व्यक्तित्व से सम्मोहित था। वे जो भी कहते, जो भी लिखते, मैं उसके कुछ बड़े माने ढूँढने लगता था। मैं अक़्सर सोचता था, इसका क्या मतलब होगा? कैसी कहानी होगी? होस्टल में मैंने अपने सीनियर संजीव जी को इसके बारे में बताया था। उन्होंने कहा कि कोई उत्तर-आधुनिक कहानी होगी। तब मैं यह समझता नहीं था कि उत्तर आधुनिकता क्या होती है। जबकि आश्चर्य की बात थी कि मेरे शोध का विषय, जो दिल्ली विश्वविद्यालय ने स्वीकृत किया था, वह था- ‘उत्तर-आधुनिकतावाद और मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास’। मेरे शोध निर्देशक थे हिंदी में उत्तर आधुनिकता के सबसे बड़े आचार्य, सुधीश पचौरी। विचार करने का काम सारा का सारा मैंने उनपर छोड़ दिया था और उत्तर आधुनिकता का मतलब यही समझता था कि जो बात ठीक से समझ में न आये वह उत्तर आधुनिकता, जो बात लीक से कुछ हटकर लगे वह उत्तर आधुनिकता। असल में यह हिंदी आलोचना का संकट है। हिंदी के आलोचकों ने पश्चिम के मॉडल उधार लिए और उनमें ही अपनी भाषा और लेखकों को फ़िट करने की कोशिश की। इससे न तो हिंदी आलोचना का भला हुआ, न ही रचनाओं के साथ न्याय। बहरहाल, सिर्फ़ शीर्षक से हम इस नतीजे पर पहुँच चुके थे कि यह एक ऐसी कहानी होने वाली है जो हिंदी में उत्तर आधुनिकता की मिसाल होगी। महीना-दो महीना, उनके यहाँ आते-जाते, उनसे बातें करते ग़ुज़रे। उन्हें लेकर जो दीवानगी थी, वह शायद हम सब में उस शख़्सियत के लिए आ जाती है जो हमारे पसंदीदा क्षेत्र का सफल व्यक्ति होता है। मैं लेखक बनना चाहता था और वे मेरे लिए साहित्य की दुनिया के सबसे बड़े सितारे थे। तो, मैं यह कह रहा था कि धीरे धीरे वह दीवानापन कम होने लगा था, उनकी सहजता, उनका सादापन बहुत जाना पहचाना सा लगने लगा था। जो अक़्सर घर के बड़े बुज़ुर्गों में हम देखते हैं।

अब मैं एक दीवाने की तरह उनकी रचनाओं को नहीं पढता था बल्कि उनके व्यक्तित्व से, उनकी पृष्ठभूमि से जोड़कर उन्हें पढ़ा करता। क़रीब महीने भर बाद, मैंने उनसे उस कहानी के बारे में पूछा तो कुछ देर तक मुझे देखने के बाद उन्होंने जवाब दिया कि असल में ‘टचवुड’ नामक वह कहानी अब नए सिरे से लिख रहा हूँ जिसका शीर्षक फ़िलहाल है- ‘मेरी शर्म भी तू मेरी शान भी तू’। अब मेरे लिए यह नई गुत्थी थी। इसका क्या मतलब। उन्होंने कुछ बताया था कि असल में इस कहानी का मुख्य पात्र मुल्तान का है। मुल्तान के सूफ़ियों के क़लाम खूब गाये जाते हैं। असल में मुल्तान सूफ़ी संगीत का केंद्र था। पंजाबी भाषा के पहले कवि माने जाते हैं बाबा फ़रीद। उनका ताल्लुक भी वहीं से था। उनकी पंक्तियाँ हैं- ‘मेरा धर्म भी तू मेरा भरम भी तू  मेरी शर्म भी तू मेरी शान भी तू’!अब मैं इंतज़ार करने लगा कि ‘मेरी शर्म भी तू मेरी शान भी तू’ कहानी पूरी हो जाए और मैं उसका पहला पाठक बन जाऊँ। वह सोशल मीडिया का ज़माना नहीं था। आज तो देखता हूँ कि असगर वजाहत जैसे वरिष्ठ लेखक भी फेसबुक पर पोस्ट लिखते हैं और बाद में उन क़िस्सों की किताब प्रकाशित करवा लेते हैं। यह कोई बुरी बात नहीं है। असल में उन दिनों इस तरह के किसी माध्यम न होने के कारण बड़े से बड़े लेखक भी ऐसे पाठक की आस में रहते थे जो उनकी रचनाओं को पढने, उनके ऊपर सम्मति देने के योग्य हो। लेखकों की अपनी मित्र मंडली या शिष्य मंडली हुआ करती थी। जोशी जी की ऐसी कोई मंडली नहीं थी। इसलिए वहाँ मुझे जगह मिल चुकी थी। उस समय के स्टारलेखक उदय प्रकाश ने मुझे उनके पास भेजा था और मेरी तारीफ़ करते हुए हिंदी की अच्छी प्रतिभाओं में एक बताया था। जोशी जी उस समय सबसे प्रभावित उदय प्रकाश के लेखन से ही थे। ख़ैर, इसकी चर्चा बाद में। अभी मेरी दिलचस्पी सिर्फ़ ‘मेरी शर्म भी तू मेरी शान भी तू’ कहानी पूरी होने में थी। यह इच्छा भी थी कि उस कहानी का पहला पाठक बनकर होस्टल जाकर अपने अग्रज लेखक संजीव जी को जलाऊँ। वे मनोहर श्याम जोशी के बड़े वाले फ़ैन जो थे।


मैंने बताया न, कि मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में शोध कर रहा था। सच बताऊँ तो हिंदी जैसे विषय में शोध करने में कुछ ख़ास करना नहीं होता। मेरे जैसे विद्यार्थी जिनको फ़ेलोशिप मिलती थी वे इसलिए शोध करते रहने का उपक्रम करते रहते थे ताकि पाँच साल तक फ़ेलोशिप मिलती रहे। इसलिए बीच-बीच में मैं शोध कार्य में व्यस्त हो जाने के बहाने ग़ायब हो जाता था। इससे जोशी की नज़र में मेरी पढ़ाकू की छवि भी बनी रहती थी। इसलिए कई बार लम्बे समय तक उनसे मिलना नहीं हो पाता था। एक कारण यह भी था कि मनोहर श्याम जोशी जी से उस ज़माने में भी मिलना इतना सरल नहीं होता था जितना कि अन्य किसी लेखक से मिल पाना। तब तो हम कमलेश्वर से लेकर राजेंद्र यादव तक न जाने कितने लेखकों से, जब चाहे मिलने चले जाते। लेखक आगे बढ़कर तपाक से हमारा स्वागत करते। किस्से-कहानियाँ सुनाते, मदद करने काआश्वासन अपनी तरफ़ से दे भी देते थे। लेकिन जोशी जी का मामला ज़रा अलग था। उनसे मिलने के लिए पहले उनको फ़ोन करना पड़ता था। फ़ोन पर आने का कारण बताना पड़ता था और तब वे समय दे देते थे। ज़ाहिर है, मिलने का बहाना अक़्सर तो नहीं निकाला जा सकता था। बहाने सोचने में ही काफ़ी वक़्त लग जाता था। ख़ैर, करीब एक महीने बाद एक दिन बहाना मिल ही गया। ‘सारिका’ पत्रिका में प्रकाशित उनके एक लम्बे इंटरव्यू के बारे में उनसे फ़ोन पर पूछा, तो उन्होंने कहा, ‘आ जाओ। उसकी प्रति है मेरे पास।’ अगले दिन शाम के पाँच बजे जब उनके यहाँ पहुँचा, तो उन्होंने पहले मुझे उस इंटरव्यू की प्रति भेंट की जो लेखक अजीत कुमार जी ने ‘कुरु कुरु स्वाहा’ के प्रकाशन के बाद उनसे लिया था। फिर हालचाल के बाद मैंने अचानक उनसे ‘मेरी शर्म भी तू मेरी शान भी तू’ कहानी के बारे में पूछा तो वे अपने टाइपराइटर के पास गए। वहाँ से टंकित फ़ुलस्केप कागज़ों का एक पुलिंदा मेरे सामने रखते हुए कहा- ‘यह उपन्यास है। अब इस नाम ‘‘हमज़ाद” हो गया है। ‘जिस महीने मैं उनसे मिलने नहीं गया, उसी महीने उन्होंने पूरा उपन्यास लिख दिया था- हमज़ाद। मुझे याद आया कि जोशी जी ने अपने एक इंटरव्यू में यह कहा था कि उन्होंने ‘कसप’ उपन्यास मात्र एक महीने में लिख लिया था। मैंने यह देखा कि वे लिखने की उधेड़बुन में तो महीनों-बरसों पड़े रहते थे लेकिन जब कहानी राह पर आ जाती थी तो उनको लिखने में अधिक समय नहीं लगता था।

प्रसंगवश, हमज़ाद  उनका ऐसा उपन्यास था जिसे कुछ लोगों ने अश्लील कहा, कुछ ने प्रसिद्धि पाने का लेखन कहा। मुझे अच्छी तरह याद है चिन्तक विद्यानिवास मिश्र को जब उन्होंने वह उपन्यास पढ़ने के लिए दिया तो विद्यानिवास जी ने उस उपन्यास को पढ़ा भी और लौटाते हुए यह राय भी दी- ‘आपने प्रयोग तो अच्छा किया है लेकिन यह उपन्यास हिंदी की प्रकृति के अनुरूप नहीं है। हिंदी साहित्य में कुछ आशा कुछ विश्वास होना ही चाहिए।आपके इस उपन्यास में तो चरम निराशा है।‘ प्रसंगवश, अधिकतर आलोचकों ने अव्वल या तो मनोहर श्याम जोशी की रचनाओं को विचार योग्य ही नहीं समझा और अगर विचार किया भी तो उनके ‘सिनिसिज़्म’ को रेखांकित किया। यानी ऐसा लेखक जिसके साहित्य में वर्तमान अन्धकारमय हो, भविष्य के लिए किसी तरह की उम्मीद न हो। याद आता है एक कवि ने कहा था कि उनके उपन्यासों में करुणा का अभाव है। बहरहाल, ‘हमज़ाद’ में यह सब चरम पर है। तब इतने घिनौने पात्र फिल्मों में भी नहीं आते थे, जो जिस रिश्ते में था उसी का दोहन कर रहा हो, इंसानियत के किसी रूप की, उपन्यास में किसी तरह की झलक तक नहीं। एक भयावह यथार्थ। उपन्यास लिखवाने वाला व्यक्ति अपने पिता की मौत की रात उसके सबसे करीबी दोस्त को पैसों के एवज में अपने बाप के घिनौनी करतूतों की कथा लिखने के लिए कहता है। उसके पिता की हत्या एक लड़की ने अपनी जंघाओं से दबा कर कर दी थी। थ्रिलर की शैली में यह उपन्यास ‘हमज़ाद’  के मिथक को कहने की कोशिश थी। मिथक यह है कि हर व्यक्ति के साथ उसके जैसा एक और पैदा होता है जो उसका हमज़ाद होता है। जो जीवन भर उसके साथ साथ चलता है।

बाद में यह उपन्यास किताबघर प्रकाशन से छप कर आया। इसकी सबसे पहलरिव्यू मैंने ही लिखी। ‘भाषा’ नाम की एक सरकारी पत्रिका में, जिसके संपादक उन दिनों वीरेन्द्र सक्सेना थे, जो साकेत के पास ही पुष्प विहार में रहते थे। ज़ाहिर है, ‘हमज़ाद’ उपन्यास की कहानी मुझे कुछ ख़ास समझ तो नहीं आई थी लेकिन बहुत अच्छी लगी थी। शायद उसके बुरे पात्रों की छायाओं को मैं पहचान पा रहा था। उसका मुख्य किरदार एक फ़िल्म निर्माता था। फ़िल्म निर्माता जी.पी.सिप्पी और उनके बेटे रमेश सिप्पी के साथ जोशी जी के पारिवारिक सम्बन्ध थे। रमेश सिप्पी ने उनके लिखे अमर धारावाहिक ‘बुनियाद’ को दर्शकों तक पहुँचाया था और रमेश सिप्पी निर्देशित फिल्म ‘भ्रष्टाचार’ के वे लेखक भी रह चुके थे। एक दिन मैंने देखा था कि चैन की नींद सोने के लिए रमेश सिप्पी उनके घर में आकर सोए हुए थे। एक दोपहर जब मैं उनके घर पहुँचा तो उन्होंने धीरे से कहा कि रमेश जी सोए हुए हैं, अभी जाओ। ख़ैर, यह कहानी बाद में। एक दिन मैंने जोशी जी से पूछा कि कहीं इसमें जो टी.के.  नारकियानी का क़िरदार है वह जी.पी सिप्पी का तो नहीं? ‘रचनात्मक साहित्य को पत्रकार की नज़र से नहीं पढ़ना चाहिए’, उन्होंने कहा और उठकर दूसरे कमरे में चले गए। अब उस उपन्यास का मुझे कोई सूत्र समझ में तो आया नहीं था, इसलिए करीब एक हज़ार शब्दों की समीक्षा में मैंने तीन बार लिखा- उत्तर आधुनिकता, उत्तर आधुनिकता, उत्तर आधुनिकता! हमज़ाद उनके जीवन काल में प्रकाशित उपन्यासों में अकेला ऐसा उपन्यास है जिसकी तारीफ़ करने वाले कम मिले, जो न अपनी कथा के लिए पढ़ा गया न ही अपने कामुक वर्णनों के लिए। लेकिन मुझे आज भी लगता है अगर सोशल मीडिया के जमाने में वह उपन्यास प्रकाशित हुआ होता तो शायद उसकी चर्चा हुई होती, शायद उसके पसंद करने वाले भी मिल जाते। लेकिन वह दौर और था, वह दबाने-छुपाने का ज़माना था। एक दिन ‘हमज़ाद’ उपन्यास को लेकर अपने एक प्राध्यापक हो चुके मित्र से बहस कर रहा था। मैं लगातार उसे महान उपन्यास बताने सम्बन्धी तर्क दे रहा था। मेरे मित्र जब तर्कों से जवाब नहीं देपा रहे थे तो अंत में बोले- ‘क्या माता-पिता के सामने सम्भोग किया जा सकता है? यह उपन्यास ऐसा ही है।‘ मुझे तब बड़ा गर्व होता था उन दिनों कि मैं जोशी जी के सबसे विवादित उपन्यास की रचना प्रक्रिया का गवाह बना था। किस तरह उन्होंने ‘टचवुड’ नाम से एक कहानी लिखनी शुरू की जो बाद में ‘हमज़ाद’ नामक उपन्यास में ढल गयी। सोचता था, एक दिन इसके बारे में लिखूँगा। लेकिन तब मेरी चिंता के केंद्र में जोशी जी के उपन्यास नहीं थे बल्कि मेरी असली चिंता यह थी कि किस तरह से उनके घर अक़्सर आने जाने का चक्कर चलाया जाए। हर बार एक नया बहाना सोच पाने में बहुत समय लग जाता था। मैं रास्ता निकालने में लगा हुआ था कि उनके घर भी मैं उसी तरह जा सकूँ जिस तरह दूसरे लेखकों के घर बेतक़ल्लुफ़ी के साथ चला जाता था।

पत्रकारिता से साहित्य जगत् में आए प्रभात रंजन सम्प्रति दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में हिंदी भाषा और साहित्य के प्रोफ़ेसर हैं। कहानीकार, उपन्यासकार और बेहतरीन अनुवादक प्रभात रंजन का ब्लॉग, जानकीपुल, नए स्वरों और प्रतिभाओं को मंच देने के लिए प्रसिद्ध है। 

हिंदी में कथेतर लेखन जितना कम है, उसके विपरीत अनुपात में उसकी दरकार बड़ी है । पालतू बोहेमियन हिंदी साहित्य में अपनी तरह की एक कृति है। गम्भीर  साहित्य और लोकप्रिय लेखन के दो अश्वों को साधते और धीरे धीरे दुनिया हारते लेकिन मन जीतते जोशी जी को प्रभात रंजन ने पुस्तक में पुनर्जीवन दिया है, वे सही अर्थों में यशोकाय हो गए हैं। उन के साथ-साथ युवा प्रभात रंजन भी प्रगट होते हैं, नब्बे के नए अवसरों वाले दशक की महत्वाकांक्षा और आदर्शों के बीच डोलते और आत्म -व्यंग्य की धार को सान देते। पालतू बोहेमियन में दर्ज हिंदी के दिग्गजों की झलकियाँ, आत्मीय दृश्य और घटनाएँ साहित्यिक जगत के बाशिंदों और उसमें में गति न रखने वालों, दोनों के लिए सामान रूप से आकर्षक हैं और इसीलिए पाठकों ने उसे लगातार बेस्टसेलर की सूची में बनाए रखा है ।


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