काठजामुन

नम्रता श्रीवास्तव

परिहा के घर की ओर जाने वाले ‘उसके’ पाँव अपना कार्य सुचारू ढंग से कर रहे थे, किन्तु कान से लेकर मस्तिष्क तक जाने वाली नली में धेनुकधारी की बातें लगातार नाच रही थीं- “काठजामुन कहीं की न खाने लायक न फेंकने लायक।” धेनुकधारी की बातों के नर्तन पर सुकेसी का क्रोध और तेज़ी से तालियाँ बजा रहा था। सुकेसी को काठजामुन कहलाने से ज़्यादा मलाल अपने काठजामुन होने का था, “हम तो काठजामुन हैं ही, पर तुम तो अब ‘दूसरकी’ ले आए ही हो, तब पर भी जब तक हमको कोस न लो तुम्हारा करेजा ठंडा नहीं होता। अइसन कुजात आदमी हमारे भाग में ठोका गया, क्या बताएँ।”

इसी मानसिक उधेड़-बुन के साथ सुकेसी अपने घर से छ: सौ-सात सौ मीटर दूर परिहा के घर आ गई। परिहा के घर पहुँच कर सुकेसी उसके घर के बगल से होती हुई पिछवाड़े पहुँच गई, जहाँ परिहा के बाबा ने आनेकानेक दवा-बीरो वाले पेड़-पालो लगा रखे थे। पिछवाड़े की ओर का दरवाज़ा घर के बड़े आँगन में खुलता था। सुकेसी ने जब आँगन में झाँका तो क्या देखती है कि बरामदे में दसियों औरतें टाट पर बैठी हैं और परिहा ने आँगन के ईशान कोने में चार गज के दायरे वाली छोटी सी छिछली गड़ही (तालाब) में ‘लेई’ (पेस्ट जैसी मिट्टी) लगा रखी है। “अच्छा लगन का महीना है न तभी कन्या की शादी वाले घर के लोग यहाँ ‘वर-संधान’ कराने आए होंगे।” सुकेसी मन ही मन सोची- “इस घर की औरतें कई पुश्तों से यह अनुष्ठान कर रही हैं, जवार में बड़ी मान्यता है इस अनुष्ठान की; हिन्दू-मुसलमान सब एक भाव से यहाँ आते हैं, ताकी उनकी बेटी का आने वाला जिनगी आबाद रहे।”

“कैसा जादुई नज़ारा बनता है जब परिहा मिट्टी की बिलाई (बिल्ली) बनाती है और अँगुरी घुमा कर जाने कइसा मंतर पढ़ती है कि बिलाई लेई में छूटते ही अपने- आप उछल-उछल कर घूमने लगती। सबका मानना था कि जितने चक्कर बिलाई लगाएगी उतने ही लाख का सुख कन्या भोगेगी। लोगों की बड़ी श्रद्धा है इस ‘बर-संधान’ में, अरे भाई कौन नहीं चाहेगा कि उसकी कन्या सुखी रहे।”

पर बिलाई की उछल-कूद और कन्या के सुख का सम्बन्ध किसी कोण से आज तक सुकेसी को समझ में नहीं आया पर मिट्टी की बिलाई का चलना उसे बड़ा चकित करता था। भगवान जाने कैसे यह जादू करती है परिहा? इस करतब को देखने में सुकेसी ऐसी मशग़ूल हुई कि धेनुकधारी की जली-कटी बातें उसे याद ही न रहीं।

“सखी जी आईं है क्या, कैसे आना हुआ?” ख़यालों में गुम सुकेसी का कंधा हिलाते हुए परिहा ने उसे ख़यालों के बाहर का रास्ता दिखाया। सुकेसी परिहा से मिलकर धीमे से मुस्काई और कहने लगी, “तुम अपना काम कर रही थी, तो हम वही देखने लगे थे। बाक़ी यहाँ काहे आए हैं तुम जानती तो हो”

परिहा शायद उसके मक़्सद से भलीभाँति परिचित थी, “गुर्च (गिलोय-एक औषधीय लता) लेने आई हो।” “छूरी दे दो तो काट लें” सुकेसी के उत्तर में कोई नयापन नही था। “अभी लाते हैं”, कहकर परिहा घर के भीतर चली गई।

सुकेसी को चाकू पकड़ाते हुए परिहा तनिक व्यंग-बोल बोली- “गुर्च खाए रहो भाभी, डाक्टर को मत दिखाओ, तुम्हारी सब बीमारी का रामबाण इ गुर्चे में तो भरा है।”

“सुना लो बबुनी सुना लो, हमारे जैसे बे-डाल-पात के पेड़ को नहीं सुनाओगी तो किसको सुनाओगी, संधान कराए वाले चले गए?” सुकेसी एड़ियों के बल खड़ी होकर नीम के पेड़ से गिलोय काटते हुए बोली।

परिहा- “चले गए लोग भाभी, एक पार्टी अभी और आएगी, इसी चक्कर में बिहाने से खाना पीना नहीं किए हैं। और अपने को बे-डाल-पात काहे कहती हो? हम-सभन नहीं हैं क्या तुम्हारे लिए।”

सुकेसी- “हाँ, हाँ  तुम तो हो ही, तुम्हारे ही दवा-बीरो से तो जी रहे हैं, नहीं बिमरिहा (बीमार व्यक्ति) तो नामे धरा गया है हमारा।”

“आज फिर कुछ कहे का धेनुकधारी भैया तुमको,” परिहा ने जिज्ञासा व्यक्त की।

“और क्या कहेंगे, कोई मनलुभौना बात निकला है आज तक? हमको काठजामुन बता रहे थे। पाँच-छः दिन से हम कब्ज़ से बेहाल हैं, दवाई के लिए कहे तो चार बात सुनाने लगे। हमसे अगर आज तक ‘ईट-पाथर’ भी नहीं जना गया तो हमार का दोस। अब तो हर बीमारी का कम-ढेर इलाज होता ही है, हमको कोसने से क्या मर्ज़ ठीक हो जाएगा। उन्हीं के बियहल है तो फिर हाथ किसके सामने पसारें, तुम्हीं बताओ।” सुकेसी अपनी रौ में लगातार बोलती गई।

परिहा- “अब दुसर की दुलहिन तो लाए हैं, अब काहे तकलीफ़ है तुमसे?”

“असल तकलीफ़ तो अब हुई है, हम तो…. ” सुकेसी की बात को बीच में ही काटकर परिहा बोली,

“अच्छा एक म्यान में दो तलवार वाली तकलीफ़?”

सुकेसी- “छोड़ो बबुनी मज़ाक मत करो, हम तो काठजामुन हैं ही, काल्ह ( कल ) नौकी (नई बहु) से मनजोरी करके कह रहे थे कि जबसे तुम आई हो सारे घर का भार तुमने ही उठा लिया है; मन हुआ कि कह दें कि नौको भार क्या उठाएँगी, अपना साज-सँवर कर ले बहुत है, भार तो तुम्हारी भौजाई उठाई थी तुम लोगों का, उसका खून चूस कर उसे तो सूखा कर फूँक आए, अब हमारे पीछे पड़े हैं ….. हैं नहीं तो।” परिहा के आगे दिल की सारी भड़ास उड़ेल रही थी सुकेसी।

परिहा ने ये सब बातें सुनने के बाद अपने होठों से सहानुभूति सूचक ‘ची’ की आवाज़ निकाली और पूछने लगी, “भाभी! नौको कहीं नौकर हैं क्या?”

सुकेसी – “हाँ। तब्बे तो गुमान है, कौनो कलेक्टर नहीं है, लेकिन महिला कल्याण विभाग में कोई छोटे-मोटे पद पर है, कुछ कमा-धमा भी लेती है, पता नहीं कैसे धेनुकधारी जैसा दिहाड़ी का डराइबर मन भा गया।”

परिहा ने सुकेसी का हाथ अपनी कलाई में पकड़ते हुए कहा- “भाभी! अब हमारी सुनो जो कुछ मन में है हमसे कह-सुन के मन हल्का कर लिया करो, चलो तुम कमरे में अंदर चल के बैठो, हम खाना खा लें तो तुमसे एक बहुत ज़रूरी बात करेंगे, जाना नहीं ठीक।”

विषाद से भरी सुकेसी को अभी घर जाने की कोई जल्दी नहीं थी तो समय काटने के लिहाज़ से परिहा का प्रस्ताव उसे भला लगा।

परिहा के घर से सुकेसी के ससुराल वालों की रिश्तेदारी थी। एक ही गाँव में निवास होने के कारण बराबर का आना-जाना था। सुकेसी जब विदा होकर आई थी, तब कुछ नान्ह उमर की रही होगी परिहा, तभी से सुकेसी के आगे-पीछे लगते-लगते समय के साथ बड़ी भी हो गई और पक्की सहेली बन गई सुकेसी की। समझदारी में तो पुरखिन है परिहा, बारह दर्जे तक पढ़ी भी है शायद।

इसके बाद ‘वर-संधान’ की रस्म कराने हेतु एक और कन्या के घर वाले आ गए। भोजनोपरान्त परिहा अपने पुश्तैनी धंधे में जुट गई। सुकेसी माटी की बिलाई का वह खेल देखकर फिर से आनंदित होने लगी और सोचने लगी यह जादू अगर उसे भी आता तो वो भी चार पैसे की मोहताज नहीं रहती। गुन-ढंग बड़े काम की चीज़ होती है। आख़िर परिहा और उसके बाबा का खर्चा तो इसी अनुष्ठान से ही चलता है, वरना इसके सम्पूरन भैया की कमाई तो दोनों बच्चों को पालने में ही चली जाती होगी। मिट्टी की बिल्ली की चमकीली आँखों में खोई सुकेसी का समय कट गया और परिहा भी अपना कार्य सिद्ध कर उसके पास आकर बैठ गई।

सुकेसी ने परिहा की थोड़ी लल्लो-चप्पो के साथ बात शुरू की- “ए सखी! इ जादू अगर हमको भी सिखा देती तो तुम्हारा कोई हरजा तो नहीं होगा ना।”

परिहा हँस कर बोली- “कइसा हर्जा भाभी? बल्कि हम तो सच में तुमको ये सब सिखाना चाहते हैं, तुम सीख लो तो हमारे ससुराल जाने के बाद इस घर का कल्याण तो होता रहेगा।”

सुकेसी को परिहा की ये आड़ी-तिरछी बातें दिमाग़ से साफ़ बाहर भागती-सी लगीं।

परिहा ने उसकी हैरानी भाँपते हुए पुनः कहा, “भाभी हम तुमसे सीधी बातें ही करेंगे….देखो इस बिल्ली में हम कोई जादू-मंतर नहीं करते। हमारे पुरखों ने चाबी से चलने वाले यंत्र को बनाने की कला खोजी थी, फिर माटी की बिल्ली में फिट करके इसे गुप्त विद्या बताकर ‘वर-संधान’ का अनुष्ठान करने लगे।”

“हाय रे” सुकेसी इस गुप्त रहस्य को जानकर विस्मित सी हो रही थी।

परिहा- “इसे सीखने से पहले हम भी तुम्हारी तरह ही अनजान थे और सीखने के बाद हैरान, हम केवल इतना जानते हैं यह हमारा पुश्तैनी धंधा है…बाकी कन्या का नसीब उसे जहाँ ले जाना होगा ले ही जाएगा। मेरा मानो तो तुम भी सीख लो इसे।”

यह सुनकर सुकेसी का मन चार बाँस बराबर कूद गया, “का मन का मुराद पूरा होना इसी को कहते हैं, का सही में बिलाई हमारा भाग बाँचने के लिए तैयार है?”

परिहा सुकेसी के मन को ताड़ने की कोशिश करने लगी और आगे बोली, “लेकिन हमारी एक शर्त है भाभी।”

सुकेसी, “शर्त कैसी?”

परिहा सीधी बात करते अभी सकुचा रही थी, फिर भी मन ही मन बात को प्रारम्भ करने के शब्द उसने सँजो लिए थे, “भाभी खाली गुर्च का काढ़ा तुम्हें कभी ठीक नहीं कर पाएगा। धेनुकधारी भैया का हाल किसी से छिपा नहीं है। इस छड़ी जैसी काया के साथ आगे के गुज़ारे के बारे में कुछ सोचा है तुमने? हमारी मानो तो तुम हमारे सम्पूरन भैया का हाथ-बाँह पकड़ लो, कचहरी में उनकी मुंशीगिरी अच्छी चलती है, तुम्हारी सब बीमारी का समुचित दवाई करा देंगे, दोनो बच्चों को अम्मा मिल जाएगी और तुम्हारे ज़िन्दगी की सबसे बड़ी कमी पूरी हो जाएगी।”

सुकेसी यह सब सुनकर जैसे धरती-आसमान के बीच हवा के हिंडोले पर झूलने लगी, “का कह रही हो बबुनी, दो बीज एक साथ लगाए जा सकते हैं दो पेड़ नहीं।”

परिहा- “सही कह रहे हैं भाभी! सम्पूरन भैया भले आदमी हैं, पुरातनपंथी नहीं हैं। अम्मा ने उनकी दुलहिन को भी बिलाई-विद्या सिखाया था, पर दुर्भाग्य से अम्मा-बाबूजी के साथ बस-जीप के टक्कर में वो भी परलोक सिधार गईं। हम अब यहाँ कितने दिन रहेंगे, बाबा हमारा भी घर-बर देखना शुरु कर दिए हैं। अब आगे इस घर की हर कमी को पूरा करने वाली वरदान हमको तुम्हीं नजर आती हो। सम्पूरन भैया ही यह बात उठाए थे, बस संकोचवश हमीं तुमसे कह नहीं पा रहे थे। शनीचर को भैया गाँव आयेंगे, तुम तैयारी रखो तो अतवार (रविवार) को उनके साथ चली जाओ। कुछ आगा-पीछा मत सोचो, जितना सोचोगी उतना ही चकराओगी…. बस तुम समझ-बूझ लो, कहो का कहती हो?”

सुकेसी परिहा के एक-एक शब्द को पीस-पीस कर सुन रही थी, परिहा की बात समाप्त होते ही एक झटके से उठ खड़ी हुई…और चलते-चलते बोली- “सवीकार है।”

जब सभी समस्याओं का समाधान मिल जाए तो कोई भी स्वयं को इन्द्र के सिंहासन का अधिकारी मान लेता है। सुकेसी के आसपास का हवा-पानी बदल गया था। घर जाते समय आधे रास्ते में कन्नू लाला की आवाज़ कान से टकराई, “ए धेनुकधारी बो (बहू), अपने दुआर का कठजमुनिया एक-दो सेर घर भिजवा देना। हमारा शुगर बहुत बढ़ गया है, काठजामुन से शुगर में बहुत फ़ायदा मिलता है।”

देवरिया, उत्तर प्रदेश की रहने वाली नम्रता श्रीवास्तव पेशे से एक अध्यापिका हैं।

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