एक अस्तित्वहीन घर की चाबियाँ

जिस समय 1947 में पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर द्वारा आयोजित मैट्रिक इम्तेहान के परिणाम घोषित किए गए, भारत और पाकिस्तान का विभाजन हो चुका था। जम्मू-कश्मीर से जिन छात्रों ने अपने प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं किए थे, उन्हें हिमाचल प्रदेश में स्थित सोलन से प्रतियाँ इकट्ठा करने के लिए कहा गया था। कुछ वर्षों बाद, मेरे दादा जी द्वारिका नाथ कौल को भी प्रमाण पत्र जारी किया गया। प्रमाणपत्र पर जारी किए जाने का साल 1952 लिखा है। यह देरी स्टाफ़ के सदस्यों और शिक्षकों के सीमा पार पलायन के कारण हुई थी।

1947 में हुए सांप्रदायिक दंगों से ठीक पहले मेरे दादा को एक नौकरी का प्रस्ताव मिला था, जो उन्हें पाकिस्तान के मुज़फ़्फ़राबाद ले जाता। किसी तरह, उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। पाकिस्तान में विस्थापित होने से इनकार करना उनके लिए अप्रत्यक्ष वरदान साबित हुआ। उनके मामा, जिया लाल पंडित, शारदा पीठ मंदिर में एक प्रसिद्ध पुजारी थे, और माना जाता था कि उन्होंने आगे होने वाली घटनाओं की भविष्यवाणी कर दी थी। मेरे दादा ने बचपन में घटी एक घटना बताई थी। उन्होंने एक पौधा लगाने की कोशिश की थी। पौधा लगाने की जद्दोजेहद देखकर उनके मामा ने उनसे कहा था कि यद्यपि पेड़ बढ़ेगा और फल देगा, फिर भी परिवार को इसका कोई फ़ायदा नहीं होगा। इसके तुरंत बाद, दंगों ने मेरे दादा को अपना गाँव छोड़ने पर मजबूर कर दिया। परिवार के भाग्य में उस पेड़ और उसपर लगे अखरोटों को देखना नहीं लिखा था। दादा जी के मामा शारदा पीठ से वापस नहीं आ पाए, और कुछ समय बाद, वे चल बसे।

 परिवार में यह एकलौती त्रासदी नहीं थी। बचपन से ही मेरे पिता मुझे कहानियाँ सुनाते आए हैं।

1947 में, जब पाकिस्तान से आदिवासी उग्रवादियों (कबाइलियों) ने कश्मीर पर कब्ज़ा करने के लिए हमला किया, उस समय  मेरे पिता के दादा, निरंजन नाथ रैना (जिन्हें तायथा कहा जाता था) अपने परिवार के साथ बारामुल्ला के पास पट्टन में रह रहे थे। जब बंदूक-धारी कबाइली गाँव में पहुँचे, तो उन्होंने कीमती सामान लूटने के लिए घरों में तोड़फोड़ शुरू कर दी। फिर उन्होंने घरों को लूटा और इलाके के दर्जनों लोगों को मौत के घाट उतार दिया। लूटपाट और हत्या के बाद, उन्होंने घरों में आग लगा दी। शुरुआती हमलों में निरंजन नाथ रैना के पिता बच गए। कई दिनों तक, वे अटारी पर रखी सूखी घास के ढेर के अंदर छिपे रहे। पर कुछ दिनों के बाद, जब छिपने के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं बची, तो कबाइलियों ने उन्हें ढूँढ निकाला और ज़िंदा जला दिया। उन्होंने पूरे घर को जला दिया। वे घर को मलबे और राख के ढेर में परिवर्तित होते देखने का इंतज़ार करने लगे। इस त्रासदी से आहत होकर, मेरे दादा और बाकी का परिवार पट्टन से श्रीनगर चले गए। उन्होंने पट्टन में अपने स्वामित्व वाली 90 नहरों में फैली ज़मीन को छोड़ दिया। कई दशक बाद, 1960 के भूमि सुधार अधिनियम के तहत वे इसका अधिकांश हिस्सा भी खो बैठे।

एक दिन, जब मेरे दादाजी अपने पुराने टिन के ट्रंक में रखे सामान में कुछ तलाश रहे थे, तब उनके हाथ उर्दू में लिखी एक पुस्तक लगी। उसका शीर्षक था ‘उम्मीद की राह’। पुस्तक में ईसा मसीह के कथन शामिल थे। 70 के दशक में कश्मीर में सक्रिय ईसाई मिशनरियों ने हिंदुओं को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने के लिए ऐसी पुस्तकें वितरित कीं। वह पुस्तक उन चंद चीज़ों में से एक थी, जिन्हें दादाजी बचा पाए थे।

मेरे पिता का जन्म 1958 में श्रीनगर के अली कदल में हुआ। उस समय, दादा जी श्रीनगर में पोस्ट मास्टर के रूप में कार्यरत थे। परिवार किराए पर रह रहा था। आगे चलकर दादा जी और पिता जी ने ख़ुद का एक घर बनाने का फैसला किया। 1974 में, उन्होंने हब्बा कदल में एक नया घर बनाना शुरू किया। निर्माण लगभग 9 साल तक चला। घर बनने के बाद, परिवार 7 साल तक उसमें रहा।

80 के दशक की शुरूआती हिंसा उन्हें सामान्य लगी, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में हिंसा की समान घटनाएँ देखी थीं। प्रमुख नेता, टिका लाल तपलू की हत्या ने उत्पीड़न का डर दुबारा फैला दिया। फिर और भी संकेत मिले। मेरी माँ समाज कल्याण विभाग में कार्यरत थीं और बारामुल्ला में तैनात थीं। एक दिन, आसपास के क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन की ख़बर सुनकर, उनके सहयोगियों ने उन्हें कार्यस्थल से जल्दी जाने को कहा। उन्होंने बस में बारामुल्ला से श्रीनगर तक, आज़ादी (भारत से कश्मीर की आज़ादी) के नारे लगाते हुए प्रदर्शनकारियों के साथ यात्रा की। उन्होंने अपनी सोने की बालियाँ छिपा लीं और अपनी बिंदी (बालियाँ और बिंदी उनकी धार्मिक पहचान के संकेत थे) को हटा दिया। उनके दिल में डर बना हुआ था।

जनवरी 1990 में, मेरे दादा-दादी और मेरी माँ का परिवार जम्मू आ गए। मेरे पिता (जो कि उस समय अविवाहित थे) भी जम्मू चले गए।

2014 में, मैंने और पिताजी ने कश्मीर की यात्रा की। वे मुझे श्रीनगर में हब्बा कदल ले गए, जहाँ उन्होंने अपना घर बनाया था। उस यात्रा के समय मैं 15 साल का था। मेरे पिताजी और दादाजी ने जो घर बनवाया था, उसे देखने के लिए मैं उत्साहित था। जब हम हब्बा कदल पहुँचे, तो घर वहाँ नहीं था। पिताजी आहत हुए। हमें पता चला कि पिताजी और दादाजी के पलायन के बाद, घर को जला दिया था।

हाल ही में, जम्मू में हमारे घर की दीवारों पर रंग-रोगन करवाते हुए, मेरे माता-पिता को शेल्फ़ पर रखे एक पुराने डिब्बे के अंदर छिपी चाबियों का एक गुच्छा मिला। पिता ने चाबियों को अपने सीने से लगा लिया। माँ भावुक हो गईं। मैंने अपने पिता और माँ से चाबियों के बारे में पूछा। उन्होंने मुझे अपने बगल में बिठाया और मुझे हर एक चाबी के बारे में बताया। ‘इस बड़ी चाबी से ड्राइंग रूम का दरवाज़ा खुलता था,’ उन्होंने कहा। ‘ये छोटी चाबी रसोई की है। ये वाली बैडरूम की है, और ये अन्न भंडार की…’ वे कहते चले गए।

पापा और मम्मी ने फिर वो मुझे चाबी सौंप दी। मुझे आश्चर्य हुआ कि क्या ये चाबियाँ किसी काम की भी थीं? अब इनका क्या महत्त्व रह गया था?

मैंने महसूस किया कि एक अस्तित्व विहीन घर की चाबियाँ हमारे पूरे परिवार की सबसे मूल्यवान संपत्ति हो सकती हैं।

2007 की गर्मियों में, जब मैं कक्षा 4 में था, मैंने जम्मू के मिश्रीवाला में खुले खेतों में हजारों तंबू देखे। मेरी माँ अपनी एक दोस्त से मिलने जा रहीं थीं जो पास में ही रहती थीं, इसीलिए मुझे भी साथ ले गयीं। पहले मुझे लगा कि तंबू ख़ानाबदोशों और चरवाहों के होंगे। मैंने देखा कि लोग एक हैंडपंप पर पानी भरने के लिए कतार लगा रहे थे। मैंने देखा, मेरी ही उम्र के कुछ बच्चे पसीने से तर-ब-तर तंबुओं के बाहर खेल रहे थे। उस समय मेरे लिए कुछ भी समझना नामुमकिन था। मुझे नहीं पता था कि टेंट में रहने वाले वो लोग मेरे ही समुदाय के थे। हमारे कुछ पारिवारिक मित्र भी वहीं रहते थे। ये लोग बेघर थे। कभी उनके पास भी घर थे। अब उनके पास सिर्फ़ उन घरों की चाबियाँ बची हैं, जो हैं ही नहीं।

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