उसे मार दिया गया क्योंकि वह एक मुख़बिर थी, आपको कोई नुक़्सान नहीं पहुँचेगा

इंदू भूषण ज़ुत्शी

दिन था 20 अप्रैल 1990 और सूरज चमक रहा था । लोग वसंत के आगमन की तैयारी में कड़ाके की सर्दी के आवेश से बाहर निकलने की प्रक्रिया में थे, जो अभी समाप्त ही हुई थी । सामान्यतः ऐसा समय पिकनिक पर जाने के लिए सबसे अनुकूल हुआ करता है, परन्तु कर्फ़्यू और पकिस्तान से कश्मीर की घाटी में होने वाली आतंकियों और उग्रवादियों की घुसपैठ ने लोगों की ऐसी कोशिशों पर अंकुश लगा दिया था ।

अनंतनाग कर्फ़्यू के अधीन था। उन दिनों जब पुलीस के लिए हिंसा बेकाबू हो जाया करती थी तब शूट-ऑन-साइट के आदेश दिए जाते। लोगों की गतिविधियाँ उनके घरों तक ही सीमित रहतीं । अप्रैल की ऐसी ही एक सुबह मैंने जब अपने कमरे की खिड़की से बाहर झाँका, तो पास ही रहने वाले एक सब्ज़ीवाले पर नज़र पड़ी, जो सब्ज़ियों से भरी हाथगाड़ी लिए मुख्य सड़क से लौट रहा था। उसकी गाड़ी देखकर जान पड़ता था कि एक भी सब्ज़ी आज नहीं बिकी थी । कर्फ्यू लागू होने की वजह से उसे लौटने पर मजबूर होना पड़ा था। उसे देखकर यह साफ़ मालूम होता था कि वो नाराज़ है। वह गाली-गलौच बड़बड़ाता चला आ रहा था। उसके बगल में रहने वाले गुलमा ने उसे बड़ी विनम्रता से चुप रहने को कहा। इसपर उस असहाय सब्ज़ीवाले ने कहा – “जब मुझे अपने काम पर जाने ही नहीं दिया जाएगा तो मैं अपने बच्चों को कैसे खिलाऊँगा? आज कर्फ़्यू का दिन है। ये आंदोलन हम जैसे गरीब लोगों को चोट पहुँचाएगा । हम भुखमरी से मर जाएँगे । भगवान अब हमें बचा लें।”

कर्फ़्यू की वजह से कार्यालय, स्कूल, कॉलेज और व्यावसायिक संस्थान अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिए गए थे। दोपहर में मैंने किसी को सड़क पर रोते और चिल्लाते हुए सुना। वो चीख मोहल्ले में पसरे सन्नाटे को भेदते हुए गुज़री। कुछ पड़ोसी अपने घरों से बाहर निकल आए और संकरी गली में इकट्ठे होकर यह पता लगाने लगे कि क्या चल रहा है। हम लोग भी सड़क पर निकले तो देखा कि हमारे पड़ोसी शम्भू नाथ, जो पेशे से एक शिक्षक थे, बदहवास से दहाड़ें मारकर रो रहे थे। “उन्होंने उसे मार दिया। उन्होंने सरला को मार दिया। उन्होंने मेरी बेटी को मार दिया।” वे बेकाबू होकर सुबक पड़े। उनके एक रिश्तेदार, पृथ्वी नाथ, उस पुलीस अधिकारी के साथ, जो उनके पास यह ख़बर लेकर आया था, उन्हें शांत करने की कोशिश कर रहे थे और उन्हें अपने घर वापस जाने के लिए कह रहे थे। मारी गयी लड़की के इस पिता को सांत्वना या दिलासा नहीं दिया जा सकता था, और वे रोते-बिलखते रहे। पुलीस अधिकारी ने हमें सूचित किया कि सरला भट को श्रीनगर में मार दिया गया था।

कहने को तो वह एक पंडित-बहुसंख्यक मौहल्ला था, पर शम्भुनाथ को मिलाकर गिनती के केवल तीन पंडित परिवार ही वहाँ रहते थे। आतंकवादियों द्वारा जारी की गयी मौत की धमकियों और कुछ मुस्लिम युवाओं के कश्मीरी पंडित अल्पसंख्यकों को दिए जाने वाले तानों और लोगों के भीतर उनके लिए ज़हर भरने की कोशिशों से प्रकट हुए सामाजिक अविश्वास ने कश्मीरी पंडितों को हमारे मौहल्ले से भागने पर मजबूर कर दिया था । रैलियों और विरोधप्रदर्शनों में लगाए जाने वाले हिंसक युद्धघोषों और उन्मादी धार्मिक नारों ने अल्पसंख्यकों को हतोत्साहित करना शुरु कर दिया था । प्रदर्शनकारितों और सुरक्षाबलों के बीच होने वाली झड़पें, पथराव और जवाबी गोलीबारी के चलते अक़्सर हिंसक रूप ले लिया करती थीं । इस उन्मादी माहौल में, हमारे पड़ोसी की बेटी की हत्या की भयानक ख़बर ने मौहल्ले के तीनों पंडित परिवारों को आघात पहुँचाया था।

हमारे मुस्लिम पड़ोसी शोक संतप्त परिवार को सांत्वना देने के लिए अपने घरों से निकले। उन्होंने एक अविवाहित लड़की की निर्मम हत्या के प्रति अपना गुस्सा और अस्वीकृति व्यक्त की। सरला भट श्रीनगर के सौरा में शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ में बतौर नर्स काम कर रही थी । वह श्रीनगर में उग्रवाद के चरम के दौरान भी काम करने जा रही थी।

किसी तरह, हम शंभू नाथ को वापस उनके घर ले गए । घर के अंदर उनकी पत्नी और छोटा बेटा शोकाकुल बैठे हुए थे। हंगामा-सा बरपा हुआ था। पड़ोसी मारी गयी लड़की के माता-पिता को सांत्वना देने की कोशिश कर रहे थे। शंभू नाथ का बेटा गुस्से और आक्रोश से उबल रहा था, फिर भी उसके गुस्से पर अपने परिवार पर सहसा टूट पड़ा यह दुःख हावी होता नज़र आ रहा था । जो मुस्लिम पुलीस अधिकारी यह ख़बर देने आया था, वह एक धर्मपरायण और ईश्वर से डरने वाला आदमी लग रहा था। उसके माध्यम से हमें पता चला कि सौरा में शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ में स्टाफ़ नर्स के रूप में कार्यरत सरला भट का 15 अप्रैल को उसके हॉस्टल से अपहरण कर लिया गया था । 19 अप्रैल की सुबह श्रीनगर के मध्य इलाके में उसका क्षत-विक्षत शव मिला। एक हाथ से लिखा हुआ नोट उसके शरीर के पास से बरामद हुआ, जिसमें उसे पुलीस का मुख़बिर बताया गया था। सरला भट चार दिनों तक आतंकियों की गिरफ़्त में रही। पुलीस अधिकारी ने हमें सूचित किया कि उसका शव श्रीनगर से खन्नाबल पुलिस थाने भेजा जाएगा, जहाँ से पुलीस कर्मी उसे अनंतनाग में हमारे इलाके में उसके माता-पिता के हवाले कर देंगे ।

इस दुःख की स्थिति में, शंभू नाथ ने हमें अपने चाचा, शाम लाल भट को ख़बर देने के लिए कहा जो बगल के मौहल्ले में क़रीब दो किलोमीटर की दूरी पर रहते थे। पड़ोस में कोई भी टेलीफ़ोन नहीं था, और कर्फ़्यू के दौरान बाहर जाना जोखिम भरा और असंभव था, फिर भी मेरे भाई और एक अन्य पंडित पड़ोसी ने हमारे क्षेत्र में तैनात सीमा सुरक्षा बल के कमांडर से मदद लेने का बीड़ा उठाया। वे संबंधित कमांडर के पास गए और उन्हें घटना के बारे में बताया। कमांडर, जो एक पंजाबी अधिकारी थे, ने धैर्यपूर्वक हमें सुना और एक वाहन प्रदान किया। दोनों को शाम लाल भट के घर ले जाया गया। बाद में, वाहन सभी को वापस शंभू नाथ के घर ले आया।

इस आने-जाने में करीब दो घंटे लग गए। जब तक शंभू नाथ के चाचा का परिवार उनके घर पहुँचा, तब तक एक बहुत ही अजीब घटना घट चुकी थी। हमने देखा कि हमारे सभी मुस्लिम पड़ोसी, जो सभा का हिस्सा थे और जो उस निर्दोष लड़की की मौत से समान रूप से व्यथित थे, गायब हो गए थे । इसने हमें चिंतित किया। वहाँ मौजूद पहले से ही आतंकित पंडित संशयग्रस्त हो गए। शंभू नाथ का परिवार शोक मनाने के लिए अकेला रह गया। हमारे कोई भी मुस्लिम पड़ोसी नज़र में नहीं थे। हमें लगा कि हमारे पड़ोसियों का अचानक गायब होना इस बात का संकेत है कि उग्रवादियों द्वारा हमें आतंकित करने की स्थिति में अपने पड़ोसियों से किसी तरह की सहायता या समर्थन की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। शंभू नाथ को लगा कि अब उन्हें भी बख़्शा नहीं जाएगा । 

शाम लाल भट के आगमन ने मुहल्ले में रहने वाले तीनों पंडित परिवारों को सांत्वना प्रदान की । उनकी उपस्थिति में हमने राहत महसूस की। वे एक बुज़ुर्ग व्यक्ति थे जिन्हें इस तरह की विकट, हताश और घातक पस्थितियों में एक मार्गदर्शक के रूप में देखा जाता था। इसके बाद, हमने सरला भट के शव का इंतज़ार किया। हमारा इंतज़ार देर रात दस बजे खत्म हुआ जब पुलीस का वाहन शव लेकर आया। शम्भू नाथ को शव सौंपे जाने पर हम सभी उसे देख भयातुर हो गए। वह गोलियों से छलनी और ख़ून से लथपथ था। पूरे शरीर पर यातना के निशान थे। यह स्पष्ट हो गया कि हत्या करने से पहले उसका यौन उत्पीड़न किया गया था ।

सरला भट अपने बीसवें वर्ष के मध्य में थी। उसके उत्पीड़क और हत्यारों ने उसके सपनों और जीवन का अंत कर दिया था। पुलीस उसके पहने हुए कपड़ों को अपने साथ ले गयी और एक रसीद  के बदले शरीर शम्भू नाथ को सौंप दिया ।

रात के बाक़ी पहर हम सभी के लिए एक बुरे सपने जैसे थे। हमने सरला भट के ठंड़े पड़े शरीर को फर्श पर रखा। उसकी त्वचा बेतरतीब थी। उसके माता-पिता और परिजनों ने सारी रात रोते-बिलखते हुए गुज़ारी। हम सब एक कोने में बैठकर मौजूदा परिस्थितियों में दाह-संस्कार के बारे में सोचने लगे। हम नहीं जानते थे कि दाह संस्कार के लिए जलाऊ लकड़ी और अन्य आवश्यक वस्तुओं की व्यवस्था कैसे करें। हम चाहते थे कि अंतिम संस्कार और क्रियाकर्म बिना किसी समस्या के किए जाएँ। कर्फ़्यू के कारण सब कुछ बंद था। हम अपने मुस्लिम पड़ोसियों के उदासीन रवैये देख रहे थे।

बाद में, हमें पता चला कि मुहल्ले में हमारे मुस्लिम पड़ोसियों को स्थानीय आतंकवादियों ने हमें किसी भी तरह की मदद की पेशकश न करने का निर्देश दिया था। आतंक की पकड़ इतनी मज़बूत थी कि बहुसंख्यक समुदाय का एक भी व्यक्ति मदद के लिए आगे नहीं आया। सभी लोग दूर रहे। सावधानीपूर्वक विचार-विमर्श के बाद, हमने पास के ही एक अन्य मुहल्ले में जाने का फ़ैसला किया जहाँ केवल एक पंडित परिवार रहता था। हम मध्य रात्रि में द्वारका नाथ के घर पहुँचे और नागबल में एक मंदिर परिसर से लकड़ी की व्यवस्था करने में उनकी मदद माँगी। द्वारका नाथ के पास एक गाड़ी थी उन्होंने हमें आश्वासन दिया कि वे अगली सुबह लकड़ी ले आएँगे। वे ड्यूटी पर तैनात बी.एस.एफ़ के जवानों से मिले और 21 अप्रैल को सुबह लकड़ी से भरी गाड़ी लेकर हमारे मुहल्ले में पहुँचे। फिर हमने दाह संस्कार की तैयारी शुरू कर दी। संस्कार करने के लिए कोई पुजारी नहीं था, कोई फूल या धूप नहीं थी, अंतिम संस्कार के दौरान आम तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली कोई अन्य सामग्री नहीं थी। हमें अपने लिए डर था। शव को श्मशान घाट तक ले जाना सुरक्षित नहीं था क्योंकि पूरा इलाका उग्रवादियों से प्रभावित था, जिन्होंने हमारी मदद करने के ख़िलाफ़ स्थानीय मुसलमानों को चेतावनी दी थी। इसलिए हमने अपने मौहल्ले के पास एक नाले के किनारे सरला भट का अंतिम संस्कार करने का फ़ैसला किया। हमने उसे अंतिम स्नान दिया। उसके शरीर पर लगे ख़ून को साफ़ किया। हमारे पास शरीर पर रखने के लिए कोई फूल नहीं थे। शंभू नाथ ने आख़री बार अपनी बेटी के शरीर को सहलाया। उसके शरीर पर शॉल रखते हुए वे रो पड़े। हमने शव को दाह संस्कार को ले जाने के लिए एक लकड़ी के तख़्त पर रखा। हममें से आठ लोगों ने शव को अपने कंधों पर दाह संस्कार की जगह ले जाने के लिए उठा लिया। संस्कार के रीति-रिवाज़ों के दौरान दो युवक मौके पर आए और हमें दाह संस्कार रोकने और अपने घरों को वापस जाने के लिए कहा। उन्होंने हमें बताया कि सरला भट पुलीस की मुख़बिर थी और उग्रवादी नहीं चाहते थे कि कोई उसका अंतिम संस्कार करे। हम सभी को यह समझ नहीं आया कि हमें क्या करना चाहिए। हमने उनसे विनती की और भीख माँगी ।  

कुछ देर बाद युवक वहाँ से चले गए। शायद हमारा दुःख और संकट देखकर उनके मन में हमारे लिए हमदर्दी जाग गयी थी। हमने जल्दी-जल्दी अंतिम क्रियाकर्म निपटाया और लगभग एक घंटे में अंतिम संस्कार संपूर्ण किया। इस स्तिथि में सभी अनुष्ठान करना संभव नहीं था।

नज़र में आने से बचने के लिए, हमने अपने मौहल्ले में वापस जाने के लिए संकरी और अँधेरी गलियों से युक्त एक अलग रास्ता लिया। हममें से कोई भी व्यक्ति सरला भट का अंतिम संस्कार करने वालों के रूप में नहीं पहचाना जाना चाहता था ।

अपने घर लौटने पर मैंने कुछ खाना इकट्ठा किया और शोक संतप्त परिवार के पास ले गया। औरतों ने मुझे बताया कि कुछ पड़ोसी घर आए थे और उन्हें शंभू नाथ के घर न जाने की सलाह देकर गए। अगले दिन, मैंने शंभू नाथ के घर जाना ठीक नहीं समझा, भले ही मैं चाहता था । मेरे पड़ोसियों की सलाह ने मुझे वहाँ जाने से रोक दिया। 22 अप्रैल को कर्फ़्यू हटा लिया गया। मैं अपने ऑफ़िस गया, और वहाँ जाते समय मैं शाम लाल से मिला उन्होंने शंभू नाथ के परिवार के बारे में पूछताछ की । मैंने उन्हें बताया कि मुझे पड़ोसियों ने शंभू नाथ से न मिलने की सलाह दी है। शाम लाल ने मुझे बताया कि शंभू नाथ और उनके परिवार ने चुपचाप कश्मीर छोड़ दिया था। यह सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। “कब? कैसे?” मैंने पूछा । उनहोंने मेरी बाँह पकड़ ली और मुझे एक तरफ़ ले गए और कहा- “अरे कल रात उनके घर पर ग्रेनेड फेंका गया और बाद में पुलिस उनके पूरे परिवार को खन्नाबल ले गई जहाँ से वे जम्मू जाने वाली बस में सवार हुए। सौभाग्य से, ग्रेनेड फटा नहीं।”

शंभू नाथ के जाने के बाद, हमारे मौहल्ले के अंतिम दो पंडित परिवारों ने सारी आशा छोड़ दी। उन्हें डर था कि उन्हें मार दिया जाएगा। 30 अप्रैल को मैंने अपने घर के बाहर हमारे मुहल्ले के दूसरे पंडित परिवार के द्वारका नाथ बख्शी के साथ कुछ खाने की चीज़ें ख़रीदने के लिए क़दम रखा । हम दोनों ही अवसादग्रस्त और उदास थे। हम सोच रहे थे कि अंत निकट है। बाज़ार में हम अपने पड़ोसी गुलाम हसन से मिले। उन्होंने सरला भट के निधन पर शोक जताया और दुर्भाग्य व्यक्त किया, लेकिन साथ ही उस पर पुलीस मुख़बिर और एक एजेंट होने का आरोप लगाया। “उसे मारा गया क्योंकि वह एक मुख़बिर थी”, उन्होंने कहा। हमने उनके बेहुदा और अनुमानित दावे पर प्रतिक्रिया नहीं दी। उन्होंने हमें सूचित किया कि बीस और मुख़बिरों को स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा उसी अंजाम पर पहुँचाया जाएगा। “चिंता मत कीजिए। आपको कोई नुक़्सान नहीं पहुँचेगा, आप यहाँ सुरक्षित हैं,” इतना कहकर वे चले गए।

Leave a Reply

Your email address will not be published.