अनुकृति उपाध्याय

ये एक बीहड़ दौर है।  बाहर-भीतर के भय हमें संत्रस्त कर रहे हैं, अनिश्चितता का घुन वर्तमान और भविष्यत की लकड़ी में घर कर गया है और हम प्रश्न पूछने में हिचकने लगे हैं। ऐसे में आइए, हम इस दालान में मिल कर बैठते हैं। घबराइए नहीं, यहाँ किसी क़िस्म की आशंका नहीं, कोई अदृश्य शत्रु घात में नहीं, कुछ कहने-सुनने पर रोक-टोक नहीं।  यहाँ सहधर्मियों का साहचर्य है और है कला और साहित्य की शमनकारी, सुखद और मन उजलाने वाली कांति। सब जो उगता-फलता है, पुष्टिकर है, स्वस्तिकर है हमने दालान में आपके लिए सँजोया है।  

यहाँ सब तरह के दृश्य और झाँकियाँ हैं, बहुत सी राहें-पगडंडियाँ हैं, इतना खुलापन है कि बाहर का हर अवरोध विस्मृत हो जाए। आप यहाँ सब टटोल सकते हैं- सुन्दर, असुंदर, प्राप्य, निषिद्ध, नया, पुराना – सब कुछ। दालान में उलझनों के समाधान हैं और समाधानों के लिए उलझनें भी, कटुता घुलाने के लिए फीकापन है तो सरस उगाने के लिए मीठापन भी। यहाँ कुछ त्याज्य नहीं, कमल और दूर्वा फूल दोनों का समान स्थान है, ताराएँ और अभ्रक कणों दोनों की ज्योति का सम्मान है।  

कला और साहित्य हर काल के हैं और किसी समय के नहीं, वे सत्य और शिव के नर्मसखा हैं, वे सुन्दर और शाश्वत हैं।

दालान में हम कला और साहित्य की क्षतिपूरक शक्ति, उनकी मन स्वस्थ करने वाली ऊर्जा में विश्वास करते हैं। दालान दल आपको इनके  पुनर्नवा  प्रभाव को अपने इस वेब-पृष्ठआज़माने के लिए आमंत्रित करता है।

अनुकृति उपाध्याय
प्रमुख सम्पादक

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