अंतिम रुदन

शिल्पा रैना

30 जून 1990

सुबह 08 बजे

घर पर सुबह से एक असामान्य हलचल पसरी है। माँ उनींदी आँखों को खुला रखने की जद्दोज़हद में हैं। हमारे चार-मंज़िला घर के कमरों में बिखरा कुछ पैक किया हुआ और कुछ अस्त-व्यस्त पड़ा सामान हमारे द्वारा किसी तरह गुज़ारी गयी लंबी और नीद-रहित रात का गवाह है।

अव्यवस्था का माहौल है। माता-पिता की आँखें अनिश्चित, सुस्त और भारी हैं, लेकिन चौकन्नी भी हैं। घर को ‘अस्थायी रूप से छोड़ने’ के फ़ैसले पर मोमबत्ती के उजाले में, कमरों के भीतर, सावधानी से लगाए गए पर्दों के पीछे या झाड़ियों में छिपकर बात-चीत की गई ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि काँपते होंठों से की जाने वाली बातें बाहर किसी के कानों तक न पहुँचें। ऐसे भी दिन थे जब मेरे दादाजी की इच्छा के विरुद्ध घर छोड़ने के बारे में कई बार सोचा गया। लेकिन उस समय कोई भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाया, गोया कोई हार मानने के लिए दोषी नहीं ठहराया जाना चाहता था। दिन में माँ और पिता निर्भय होने का दिखावा करते हैं, लेकिन हर रात जब मस्जिद के लाउडस्पीकर से तेज़ और भयानक आवाज़ें सुनाई देती हैं, तो डर उनके दिल को दहला देता है; दिलों की बात दिल से, आँखों की आँखों से , जिनमें तड़प और निराशा साफ़ झलकती है। डरावनी आवाज़ें आ रही हैं। ‘क्या वे हमारे लिए आ रहे हैं? क्या हम उनके निशाने पर हैं?’

आखिरकार, पिछले महीनों के दौरान उन्होंने जो कहानियाँ सुनीं, वे अब उनकी आँखों के सामने प्रत्यक्ष खेल रही हैं। हमारी अपने ही घर से बे-दख़्ल हो जाने की कहानी। ‘आपको यह जगह छोड़नी होगी’, हम से कहा गया था।

 हमारे इलाके में हो रहे परिवर्तनों की व्याख्या या वर्णन करना आसान नहीं है। किसने कल्पना की थी कि हम डर और हिंसा के बवंडर में फँस जाएँगे? सड़कों पर ख़ून की छवियाँ याद आती हैं और भीतर एक दर्द उभरता है। खींचे जाने और घसीटे जाने, पिटने और धमकी दिए जाने की याद! हमारा जीवन दॉँव पर है। हमारी पहचान भी! यह वह जगह है जहाँ असमानता उग आई है, अनिश्चितता हमारे और अन्य लोगों के घरों पर मंडरा रही है। उन बहादुर लोगों की तरह, जो इस जगह को छोड़ना नहीं चाहते, मेरा परिवार भी लड़ाई नहीं छोड़ना चाहता है। नहीं, हम गए नहीं। हमने हार नहीं मानी, इतनी आसानी से नहीं। हम कुछ आखिरी परिवारों में से हैं जो अपने ही पड़ोस में एक अदृश्य जीवन व्यतीत करके ज़िंदा रहने की कोशिश कर रहे हैं, अपने ही घरों में भगोड़ों की तरह। पिता पूरी कोशिश कर रहे हैं कि नकाबपोश आदमियों से नियमित अंतराल पर उन्हें मिलने वाली धमकियों से भयभीत न हों। वो अक़्सर हमारे दरवाज़े पर दस्तक देते हैं और चेतावनी पत्र सौंपकर चले जाते हैं। ‘यहाँ से चले जाओ, नहीं तो अंजाम के लिए तैयार रहो’ उन पत्रों में अक़्सर लिखा रहता है। वे चेतावनियों को नज़रअंदाज़ करते रहे हैं। वे अभी तक प्रार्थना ही कर रहे थे और हालात के बेहतर होने की उम्मीद लगाए बैठे थे।

लेकिन किसी अदृश्य शक्ति ने पिछले सप्ताह ही उनकी राय बदल दी। उसी के परिणामस्वरूप, हम यहाँ हैं, तैयार, अपना घर छोड़ने के लिए। तैयारी के लिए पूरा एक सप्ताह होने के बावजूद, घर अव्यवस्थित-सा है; हर कोई व्याकुल है। हमें जम्मू ले जाने वाले  ट्रक के आने के बाद से घर पर सभी लोग घबराए हुए और चिंतित हैं। अब क्या होने वाला है? क्या किया जाए? माँ और पिता ने ट्रक पर घरेलू सामान को लोड करने में एक-दूसरे की सहायता करने के लिए मोर्चा संभाला। पहले बड़ी और भारी चीजें। छोटी और हल्की उनके बाद।

जून 27

रात 10  बजे

क्या हमें ये जैकेट, ऊनी कपड़े और कंबल ले जाने चाहिए?, माँ ने पिताजी से पूछा।

‘हमें जम्मू में उनकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी। वह जगह नर्क की तरह गर्म है, और उम्मीद है, हम जल्द ही वापस आ जाएँगे । ‘

‘अगर कभी वापस आना हुआ ही नहीं, तो?  तब हम क्या करेंगे? हमें कम से कम कुछ ऊनी कपड़े ले जाने चाहिए,’ दादी ने कहा, जैसे कि वे जानती हों कि भविष्य में क्या होने वाला है।

‘ऐसा नहीं होगा। हम गर्मियों से पहले वापस आ जाएँगे। कौन वहाँ की भयानक गर्मी में भुनना चाहेगा?’, दादाजी ने बीच में टोकते हुए कहा। वे खिन्नता से बोले, ‘मुझे वहाँ के मौसम के बारे में अच्छी तरह पता है। मैंने महसूस किया है। हम उस गर्मी को नहीं झेल पाएँगे, ‘उन्होंने चेतावनी दी। वे 80 के दशक की शुरुआत में उधमपुर में अपने शिक्षण कार्य में बिताए दिनों को याद करते हुए बोले।

‘हमें केवल बेहद ज़रूरी चीज़ों को ले जाना चाहिए। हमें हल्के सामान के साथ यात्रा करनी चाहिए। हमें दूसरों का सामान भी पैक करना होगा। उन्हीं चीज़ों पर ध्यान दिया जाए जो उपयोगी और बहुत ज़रूरी हैं,’ पिताजी ने कहा।

‘इसका मतलब है कि मेरी किताबों के लिए ट्रक में कोई जगह नहीं होगी?’ दादाजी ने फुसफुसाते हुए कहा।

“आप कभी-कभी किस तरह की बेतुकी बातें करते हैं?” दादी ने अनमने ढंग से कहा। उनके चेहरे पर झुंझलाहट साफ़ दिखाई दी। “मैं हैरान हूँ। यहाँ हम उन चीज़ों को पैक करने की कोशिश कर रहे हैं, जो बहुत कीमती हैं और एक अजनबी शहर में हमारे लिए उपयोगी साबित होंगी, और आप अभी भी अपनी किताबों की रट लगाए बैठे हैं।”

“मैं इसी कारण से तो कह रहा हूँ कि मैं नहीं जाना चाहता, लेकिन मेरी कभी कोई नहीं सुनता। इन बातों में मुझे शामिल मत करो, जो चाहो ले जाओ।” दादा जी ने कहा और अचानक कमरे से चले गए।

दादा जी की दुनिया पूरी तरह से उनकी अमूल्य संपत्ति, किताबों के इर्द-गिर्द केंद्रित है। उन्होंने अपने जीवन के अधिकांश समय में किताबें इकट्ठी कीं। हमारे घर में कई कमरे हैं और हर कमरे में किताबें हैं। घर की सबसे ऊपरी मंज़िल में, दादाजी, जिन्हें हम पापा कहते हैं, किताबों पर किताबें, पत्रिकाओं पर पत्रिकाएँ और कागजों पर कागज़ रखे हुए हैं। पढ़ने की जगह के आसपास किताबों की एक दीवार-सी है। किताबी कीड़ों और अनुसंधान विद्वानों के लिए एक खज़ाना! पापा की विद्वान के रूप में एक अलग ही ख्याति है। उनके पास दो मास्टर डिग्रियाँ हैं, एक अर्थशास्त्र में और एक राजनीतिक विज्ञान में। उन्होंने एक विश्वसनीय और मेहनती प्रोफेसर होने की प्रतिष्ठा पाई है।

उनके मुस्लिम छात्रों ने संख्या में  हिंदू छात्रों को पछाड़ दिया था। वे सरकारी कॉलेज से सेवानिवृत्त हो चुके हैं लेकिन अभी भी डलगेट के पास एक हाई स्कूल में पढ़ाते हैं। पर, पिछले कुछ दिनों से वे घर से बाहर नहीं निकले हैं। “मुझे लगता है कि पड़ोस का कोई व्यक्ति मुझ पर नज़र रख रहा है,” उन्होंने मेरे पिताजी से कहा। उन्हें शक है। वे जो कह रहे हैं वह एक फ़िल्म की पटकथा से मिलता-जुलता है, जिसमें एक चरित्र को अपने ही इलाके में नज़र रखे जाने का डर रहता है। कोई उनपर नज़र क्यों रखेगा? आख़िरकार, वे सिर्फ़ एक आम प्रोफ़ेसर ही तो हैं?

उनकी न जाने की इच्छा के पीछे  उनके अध्ययन कक्ष के पुस्तकालय की पुस्तकों के प्रति उनके जुनूनी लगाव का बहुत बड़ा हाथ है। घर छोड़ने का विचार मात्र, उनकी श्रद्धेय जगह… वे तड़प उठते हैं। वे अपने लिए बनाई गई छोटी दुनिया में संतुष्ट है। किताबों और लेखन की दुनिया! पढ़ना उन्हें ताक़त और जीने का सहारा देता है। वे दर्शन, इतिहास, अर्थशास्त्र और साहित्य में रमे रहते हैं। घर छोड़ने की उनकी अनिच्छा घर में सभी को चिंतित कर रही है। 23 जून को, हमारे पड़ोसी, पृथ्वी नाथ टिक्कू, को उनके घर के ठीक बाहर आतंकवादियों ने मार डाला। उनकी हत्या एक संकेत थी कि हमारे समुदाय में कोई भी सुरक्षित नहीं।

अंत में, दादाजी बढ़ते दबाव के चलते हार मान जाते हैं। लेकिन वे वापस लौटने की उम्मीद नहीं छोड़ते। वे अपने कमरे से बाहर नहीं आना चाहते हैं।

30 जून

सुबह 7 बजे

दादी ने खाना पकाने का दायित्व लिया है और माँ ने ट्रक पर सामान चढ़ाने में पिता जी की मदद करने का फ़ैसला किया है। चीनी ख़रीदने के बाद पापा अभी राशन घाट से वापस आए हैं। वे यह सुनिश्चित करना चाहता है कि हमें खाद्य सामग्री की कोई चिंता न हो।

सामान चढ़ाने की प्रक्रिया शुरु हो गई है और बड़े ताल-मेल के साथ जारी है। एक कुली पिताजी को ट्रक तक सामान ले जाने में मदद कर रहा है। माँ देख-रेख कर रही हैं और कड़ी निगरानी रखे हैं। पापा सतर्कता बरतने और ट्रक के डिब्बे में सामान को ठीक से व्यवस्थित करने के लिए ट्रक के पास ख़ुद खड़े हैं।

ट्रक गली के सबसे अंतिम छोर में स्थित हमारे पड़ोसी के घर के परिसर के अंदर पार्क किया गया है। मेरा दो साल का भाई और मैं कुली की निगरानी करने और पिताजी की सहायता करने के लिए अपने घर के दरवाज़े के पास खड़े हैं ताकि ज़रूरत के वक़्त वो हमें आवाज़ दे सकें। मेरा भाई और मैं अपने उत्साह को छिपाने में असमर्थ हैं। जम्मू में पहले से मौजूद हमारे चचेरे भाई-बहनों और परिवार के अन्य सदस्यों से मिलने की संभावना हमारे उत्साह का कारण है।

“तुम दोनों यहाँ मोर्चे पर डटे रहो मैं थोड़ी देर में आता हूँ,” पापा ने हमें फुसफुसाते हुए कहा।

सब कुछ ठीक चल रहा है। क्षण बीतते हैं। कहीं दूर एक चीख सुनाई देती है और हम सहम जाते हैं । चीख फिर सुनाई देती है, इस बार पूरी तीव्रता के साथ। ‘मोरोसा’ (मैं मारा जा रहा हूँ) ये डरावनी चीख गली के अंत से आ रही है। मैं डर गया क्योंकि मुझे पता है कि कुछ भयानक हुआ है। मेरा भाई मुझसे कुछ कदम दूर है। हम एक-दूसरे की आँखों में देखते हैं, न जाने क्या हो गया है। हमारे घर का मुख्य द्वार खुला हुआ है। हमें नहीं पता कि क्या करना चाहिए। इससे पहले कि हम उस ओर जाने का साहस करते, मेरे पिता ने हमारे ऊपर झपट्टा-सा मारा और हमें अंदर जाकर छिप जाने का आदेश दिया। वे गेट बाहर से बंद कर देते हैं और चले जाते हैं।

30 जून

सुबह 9:30 बजे

माँ चिंतित हैं। थोड़ी-थोड़ी देर में वे मुझे  मुख्य हॉल की खिड़की के एक कोने से बाहर झाँककर देखने के लिए कहती है। “देखो तो वहाँ क्या चल रहा है,” वह हमारे मुस्लिम पड़ोसी के घर के बरामदे की ओर इशारा करते हुए धीमे स्वर में कहती हैं। बरामदा खिड़की के ठीक सामने है। एक घंटा बीत जाता है। पिताजी का लौटना अभी बाकी है। वो भयावह चीख जो सामान चढ़ाते समय सुनाई दी थी, कानों में अभी भी गूँज रही है। सामान उतारने की प्रक्रिया में चीख ने खलल डाल दिया। अब हमारा आधा सामान ट्रक में है और बाकी घर में है। माँ के पास हमारे प्रस्थान में देरी पर परेशान होने के सभी कारण हैं। बेचारा कुली, वे फुसफुसाते हुए कहती हैं उन्हें लगता  है कि वह चीख उसी की थी।

पिताजी कहीं नज़र नहीं आ रहे हैं। “वे इतना लापरवाह और भुलक्कड़ कैसे हो सकते हैं,” माँ ने कहा। वे हमेशा ऐसा ही करते हैं । हम हॉल में इकट्ठे बैठकर, पिताजी के लौटने का इंतज़ार कर रहे हैं। अब तक यह हॉल हमेशा अच्छे और ख़ुशहाल समय का गवाह रहा है। इसने उत्सव देखे हैं। यह वो जगह है जहाँ परिवार के सभी लोग पूरे दिन के काम के बाद एक साथ बैठकर बात किया करते हैं। इस हॉल ने कभी ऐसी उदासी नहीं देखी, जिसमें यह अभी लिपटा हुआ है। इसने बेहतर दिन देखे हैं।

हॉल अब उस भयावह चुप्पी और डर का गवाह बन चुका है, जो मेरे चाचाओं और उनके परिवारों के प्रस्थान के साथ आयी था। एक-एक करके वे सब चले गए। बारह के एक अच्छे-ख़ासे समूह से, हम अब छह हो गए हैं। यदि आज, सभी योजना के मुताबिक़ होता है, तो यह घर में हमारा आख़िरी दिन होगा।

हमारे पड़ोसी के घर से कुछ क़दम दूर, जहाँ मैं और मेरा भाई कुछ समय पहले खड़े थे, ख़ून इकट्ठा हो चूका  है। कुली का खून, मेरी माँ का मानना ​​है। माँ  पिताजी की एक झलक पाने की उम्मीद में खिड़की से बाहर झाँककर देखती हैं। ट्रक भी चला गया है। उसका कोई संकेत नहीं है। क्या पापा जा चुके हैं? क्या उन्होंने हमें पीछे छोड़ दिया है? या यह कोई मज़ाक है? क्या चल रहा है?

माँ गरीब कुली के लिए एक मूक प्रार्थना कहती हैं।

घबराहट में क्षण बीत जाते हैं।

सुबह 10 बजे

माँ की नज़र घड़ी पर टिकी है। वे रह-रह कर मेरी तरफ़ देखती हैं। अनिश्चित स्थिति में फँसा नौ साल का बच्चा होने के नाते, मैं रुआँसा हो रहा हूँ।  मैंने माँ को कहते सुना, “क्या तुम खिड़की पर जाकर अपने पापा को आवाज़ देकर ये पूछ सकते हो कि वो जल्दी करें, अगर वो तुम्हारी आवाज़ सुन लें और जवाब दे दें तो उन्हें बुला लो।”

माँ उठती हैं और खिड़की से बाहर देखती हैं। उन्हें केवल मेरे पिता की एक छाया-सी नज़र आती है जो ढेर से पुलिसकर्मियों से घिरी हुई है। दादी चुप हैं। वे जानती हैं कि उनका बेटा दूसरों कि मदद करने में हमेशा आगे रहता है। मेरा भाई सो गया है, और एक अजीब-सी ख़ामोशी ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है।

सुबह 10:10  बजे

आवाज़ें…

“मैंने उन्हें देखा। वे दो जवान लड़के थे। मैं उनके चेहरे को नहीं देख सका क्योंकि उनकी पीठ मेरी ओर थी। मैंने ज़ोर से रोने की आवाज़ सुनी। मैं ट्रक के पास था, और जब तक मैं मौके पर पहुँचा, तब तक वे उसे मार चुके थे,” एक आदमी पुलिसवालों से कह रहा है। कुछ देर रुककर वो फिर कहता है, “मैं मौके पर पहुँचा और उसे यहाँ लाया। मैंने उसके मुँह में थोड़ा पानी डाला, लेकिन वह तब तक मर चुका था।”

पुलिसकर्मियों का कहना है कि उसे दो बार गोली मारी गई है। “एक गोली छाती में और दूसरी गर्दन में लगी है। हमें शव को पोस्टमार्टम के लिए ले जाना होगा।”

हमारे परिवार में, मेरे पिताजी को सभी की देखभाल करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। पहले ही ख़तरा भाँपकर उन्होंने अपने छोटे भाइयों को जम्मू में सुरक्षित ठिकानों पर जाने को कहा था। उनके लिए यह आसान था। एक बैंक में काम कर रहे थे इसीलिए ट्रांसफ़र आसानी से हो गया; और छोटे ने अपने करियर की शुरुआत ही की थी।

यह उनका व्यवसाय है जिसने पिताजी को अपने घर से दूर नहीं जाने दिया। उन्होंने अभी तक कोई लाभ नहीं कमाया है । वे भी अन्य लोगों की तरह, भविष्य में आने वाली इस अनिश्चितता के लिए तैयार नहीं थे। एक नए शहर में फिर से व्यवसाय स्थापित करने के बारे में सोचना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है।

इस भीषण घटना के साथ, बाकी सब कुछ ध्वस्त हो चुका-सा प्रतीत होता है। अब हमारे सामने नई चिन्ताएँ हैं।

सुबह 11:00 बजे

एक और घंटा बीत चुका है और पिता अभी भी पड़ोसी के घर पर हैं। माँ अब तक बहुत परेशान हो चुकी हैं। उन्होंने अपना धैर्य खो दिया है। उनके चेहरे पर हताशा साफ़ दिखाई दे रही है। उनके सवाल अनुत्तरित हैं। डर ने हमारे दिलों पर पकड़ जमा ली है। पड़ोसी के घर में पिता की अस्वाभाविक उपस्थिति और कुली की निर्दयतापूर्वक हत्या की पूछताछ में उनकी निरंतर भागीदारी मेरी माँ को पागल कर रही है। क्या वे हमारी परवाह नहीं करते हैं? माँ को आश्चर्य होता है।

अचानक, वे आतंकित हो उठती हैं। उनका गला सूख जाता है। “कुछ ठीक नहीं है,” वे बड़बड़ाती हैं।

“क्या होगा अगर यह कुली न हुआ!!!’

वे रुकती हैं। उनके चेहरे पर एक भयावह-सा भाव है।

“क्या हो अगर…?”

“नहीं!”

“यह सच नहीं हो सकता।”

“यह हमारे साथ नहीं हो सकता।”

“लेकिन फिर, वे अभी भी वहाँ क्यों है?”

“क्या उन्होंने…?”

“क्या वे…?”

विचित्र विचारों की एक परछाई उनके मन पर छा जाती है। क्या उन्हें भ्रांतियाँ हो रही हैं?

वे बाहर नहीं जा सकतीं क्योंकि मुख्य द्वार को बाहर से बंद किया गया है। लेकिन फिर वे जल्दी से उठती हैं और उस खिड़की की ओर भागती हैं जहाँ से उन्होंने ख़ून देखा था। मैं उनके चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ क्योंकि अचानक वे शांत हो गयी हैं, अधिक चिंतनशील। उनकी थकी हुई आँखों में डर झलक रहा है।

मैं उनके पीछे जाता हूँ। मैं रक्त देखने के लिए उत्सुक हूँ। माँ कहीं खोई हुई हैं और मेरा उनके पीछे जाना उन्हें नहीं सता रहा है। उनके डर से बेख़बर, उनके बगल में खड़ा, मैं खिड़की से बाहर देखता हूँ। गली सुनसान है। मैं दूर के छोर की ओर देखता हूँ। वहाँ इकट्ठे ख़ून की छवि ने मुझे भयभीत कर दिया है। मैं इससे छुटकारा नहीं पा सकता, मैं कुछ भी देखना नहीं चाहता।

हम इंतजार करते रह जाते हैं। जैसे ही मैं कमरे में वापस जाने लगता हूँ, वैसे ही एक आदमी गली में घुसता है। उसका चेहरा परिचित है। वह पड़ोस से है। वह हमारे घर के मुख्य द्वार के करीब है। “क्या आप बता सकते हैं कि यहाँ क्या हुआ है?” माँ पूछती हैं।

आदमी हैरान-परेशान दिखता है। वह मेरी माँ को विस्मय से देखता है, और फिर कहता है, “आपको नहीं पता कि प्रोफ़ेसर नील कंठ को मार दिया गया है।”

दिल की धड़कनें अचानक थम जाती हैं।

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